लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज

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- भारती पंडि त
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युवावस्था में सेटल होते ही सबसे बड़ा सवाल आता है शादी कब होगी? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कुंडली सटीक काम करती है। सबसे पहले तो यह देखे कि शादी होगी भी या नहीं? कुंडली में सप्तम भाव विवाह का और व्यय भाव शैय्या सुख का माना जाता है।

यदि सप्तम भाव, उसका स्वामी और सप्तम भाव में बैठा ग्रह सभी सही स्थिति में है। किसी भी बुरे ग्रह या कमजोर नक्षत्र के प्रभाव में नहीं है, तो यह बात तय है कि विवाह होगा तो जरूर। यदि व्यय भाव और उसके स्वामी की स्थिति भी ठीक है तो विवाह से सुख भी मिलना तय है।

अब इस बात पर विचार किया जाए कि विवाह कब होगा। पहले विवाह की सामान्य आयु 23-24 वर्ष मानी जाती थी। जो अब बढ़कर 26-27 हो चली है। यदि बाकी सारी बातें सामान्य हो तो विवाह तकरीबन इसी आयु में हो जाता है। यदि सप्तम भाव पर मंगल का प्रभाव हो तो विवाह 28 से 30 के बीच होता है।

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यदि सप्तम में शुक्र या चन्द्र हो तो विवाह 24-25 वर्ष में और शनि हो तो विवाह 32 के बाद होता देखा जाता है। शनि के बारे में एक और बात पर गौर करें। यदि शनि कुंडली में 1, 4, 5, 9, 10 का स्वामी होकर सप्तम में हो और गुरु या शुक्र की दृष्टि में हो तो विवाह बहुत जल्दी हो जाता है। सप्तम में अकेला गुरु विवाह में देरी करता है, राहू बनते विवाह को बिगाड़ता है।

प्रेम विवाह : यदि पंचम भाव के स्वामी का सप्तम भाव से, लग्न से या व्यय भाव से कोई सम्बन्ध बनता हो, तो प्रेम विवाह या परिचय विवाह ही होता है। यदि पंचमेश सप्तम में हो या सप्तमेश पंचम में हो तो भी प्रेम विवाह ही होता है। यदि पंचम या सप्तम का स्वामी व्यय में हो तो मनचाहा विवाह होता तो है, मगर विवाह से सुख नहीं मिल पाता। यदि पंचमेश या सप्तमेश शुभ ग्रह होकर राशि परिवर्तन करते हो तो विवाह सुखमय और भाग्य को बढ़ाने वाला रहता है। यदि ये अशुभ ग्रह होते है तो मतभेद बने रहते है। सप्तमेश का लग्न में होना भी परिचय विवाह कराता है।

विशेष : जो जातक मांगलिक होते है, उनका यदि प्रेम विवाह भी हो रहा हो तो वे अक्सर उसी जातक की और आकर्षित होते है, जिनकी कुण्डली मंगल से प्रभावित होती है या जिनकी कुण्डली में शनि-राहू प्रबल होते हैं। इस प्रकार अधिकांश मंगल दोष का यूँ ही निराकरण हो जाता है।

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