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क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है? ग्रह गोचर से मिल रहे चौंकाने वाले संकेत

WD Feature Desk
शुक्रवार, 6 मार्च 2026 (15:01 IST)
Third World War: वर्षों से कयास लगाए जा रहे हैं कि तीसरा विश्‍व युद्ध होने वाला है या दुनिया खत्म होने वाली है, लेकिन अभी तक न तो वर्ल्ड वॉर हुआ और न ही दुनिया खत्म हुई। वर्षों से भविष्यवाणी की जा रही है कि एक उल्लापिंड गिरेगा और सबकुछ खत्म। आसामान से एलियन नीचे उतरेंगे और फिर वे क्या करेंगे यह कोई नहीं जानता। ऐसी कई तमाम भविष्वाणियों से भरा है इंटरनेट जगत के सभी प्लेटफॉर्म। चलिए जानते हैं इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी, जो आपने अब तक नहीं पढ़ी होगी।
 

ग्रह गोचर और विश्‍व युद्ध:

1. युद्ध के लिए शनि और मंगल के साथ ही राहु के गोचर को जिम्मेदार माना जाता है। इनकी युति या आपसी दृष्टि, वक्री चाल आदि से धरती पर नकारात्मक असर देखने को मिलता है।
2. शनि बड़े युद्ध को जन्म देता है खासकर तब जब यह खुद की राशि या मंगल की राशि में स्थिति हो।
3. अतिचारी बृहस्पति भी युद्ध के हालात पैदा करता है तब जबकि शनि पॉवरफूल स्थिति में हो। 
4. ग्रहण को भी युद्ध के लिए जिम्मेदार माना गया है। खासकर तब जब दो पूर्ण ग्रहण पास पास हो या वर्ष में 4 से ज्यादा ग्रहण हो। 
 

ग्रह गोचर का पुराना इतिहास:

 

शनि का गोचर:

1. 1937 में मार्च में जब शनि मीन राशि में आया था तब द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो चली थी। चीन ने जापान पर आक्रमण किया और धीरे-धीरे दुनिया में तनाव बढ़ता गया।
 
2. 1965-66 के बीच जब शनि मीन में जाने वाला था तक भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए इंदिरा गांधी को अपना नेता चुना। इसके बाद अखिल भारतीय स्तर पर गोरक्षा आन्दोलन चला, जिसमें हजारों हिंदुओं का नरसंहार किया गया। दूसरी ओर वियतनाम युद्ध हुआ था। 
 
3. 1995 के जून में शनि मीन राशि में आया था तब जापान में बड़ा भूकंप आया था जिसमें हजारों लोग मारे गए थे और बोस्नियाई युद्ध में करीब 8,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
 
4. 29 मार्च 2025 को शनि ने जब मीन राशि में प्रवेश किया तब इजराइल ईरान युद्ध के साथ ही भारत पाकिस्तान का छोटा युद्ध हुआ। वर्तमान में शनि इसी राशि में है।
 

शनि के गोचर से कैसे बदला दुनिया का भविष्य?

1. शनि ने जब 24 जनवरी 2020 में मकर राशि में प्रवेश किया था, तब दुनिया में कोरोना महामारी का प्रकोप फैल गया था। फिर शनि ने जब 29 अप्रैल 2022 को कुंभ में प्रवेश किया तब महामारी का दौर खत्म हुआ और दुनियाभर में युद्ध, अराजकता, महंगाई, प्रदर्शन और सत्ता परिवर्तन का नया दौर प्रारंभ हुआ। 28-29 अप्रैल 2022 के दरमियान शनि ग्रह अपनी खुद की राशि मकर से निकलकर खुद ही की राशि कुंभ राशि में प्रवेश किया था। 29 अप्रैल 2022 को शनि ने मकर से निकलकर कुंभ राशि में जब प्रवेश किया तो उसी के आसपास यूक्रेन और रशिया का वार शुरू हो गया। इसके कुंभ गोचर के काल में ही भूकंप और बड़े तूफान के साथ ही अब इजरायल और हमास का युद्ध भी शुरु हो चला है। शनि जब अपना मार्ग बदला तब इजरायल और हमास का युद्ध शुरू हो गया था। 
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सूर्य और चंद्र ग्रहण का पुराना इतिहास:

ज्योतिष मानते हैं कि एक ही वर्ष में 5 या 5 से अधिक ग्रहण होने से देश और दुनिया में विषम परिस्थितियों का जन्म होता है।
 
1913: 1913 में वर्ष 1913 खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इस वर्ष कुल 5 ग्रहण हुए थे। इनमें 3 चंद्र ग्रहण और 2 सूर्य ग्रहण शामिल थे। इसके बाद 1914 में विश्‍व युद्ध के हालात बने। इस वर्ष को "World War I Eclipse" भी कहा गया।
 
1935: इस साल भी 7 ग्रहण हुए थे, जिनमें 5 सूर्य ग्रहण (जो कि सौर गणना की अधिकतम सीमा है) और 2 चंद्र ग्रहण हुए थे। 1935 का साल राजनीतिक बदलावों, युद्ध की तैयारियों और भारत में प्रशासनिक सुधारों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इटली ने इथियोपिया पर हमला किया था। इसी घटना ने विश्‍व युद्ध को जन्म दिया। आगे चलकर 1939 में महायुद्ध हुआ। 
 
1879 में में 7 और 1917 में 6 ग्रहणों का योग बना था। 1879 में एंग्लो-जुलू युद्ध, द्वितीय एंग्लो-अफगान युद्ध का दौर
 
1982: एक साल में 7 ग्रहण (जो कि अधिकतम सीमा है) बहुत कम बार होते हैं। पिछली बार ऐसा 1982 में हुआ था। भविष्य में यह दुर्लभ संयोग इन वर्षों में बनेगा। इस दौरान फ़ॉकलैंड युद्ध हुआ और इजराइल ने लेबनान पर हमला करके नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दिया। इस साल एशियाई खेल भी हुए थे जिसका पहली बार प्रसार टीवी पर हुआ।
 
2011: इस वर्ष भी 4 सूर्य ग्रहण और 2 चंद्र ग्रहण हुए थे।
 
2018-19: वर्ष 2018 और 2019 में 5-5 ग्रहण लगे थे तभी से देश और दुनिया में नए दौर की शुरुआत हुई।
 
2020: हाल ही में वर्ष 2020 में कुल 6 ग्रहण हुए थे (2 सूर्य ग्रहण और 4 चंद्र ग्रहण) जो ज्योतिषीय और वैश्विक उथल-पुथल की दृष्टि से काफी चर्चा में रहा था। आने वाले समय में 2029 में 6 ग्रहण (4 सूर्य और 2 चंद्र) लगेंगे। अगला 7 ग्रहण वाला वर्ष 2038 होगा (3 सूर्य, 4 चंद्र) और उसके बाद 2094 में ऐसा होगा।
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अतिचारी गुरु के कारण चल रहा है शनि का दंड:

14 मई 2025 से बृहस्पति ग्रह अतिचारी चाल चल रहे हैं। अतिचारी का अर्थ है कि वैसे तो बृहस्पति एक राशि में एक वर्ष तक रहते हैं लेकिन वर्तमान में वे तेज चाल चलते हुए एक वर्ष में 3 राशियों को पार कर जाएंगे। इस दौरान वे वक्री गोचर करे पुन: पिछली राशियों में आकर पुन: आगे बढ़ते जाएंगे। यह स्थिति जब भी बनती है तो देश और दुनिया में जलवायु परिवर्तन के साथ ही युद्ध के हालात बनते हैं।
 
गुरु की यह असामान्य गति अगले 8 वर्षों तक जारी रहने वाली है। ज्योतिषीय इतिहास गवाह है कि जब-जब गुरु अतिचारी हुए हैं, पृथ्वी पर बड़े सत्ता परिवर्तन और युद्ध हुए हैं। इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि लगभग 5000 साल पहले महाभारत युद्ध के समय भी गुरु 7 वर्षों तक अतिचारी रहे थे। यही स्थिति प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी देखी गई थी। हाल ही में 2018 से 2022 के बीच जब गुरु अतिचारी हुए, तो पूरी दुनिया ने 'कोरोना' जैसी वैश्विक विभीषिका और आर्थिक मंदी का सामना किया। अब वैसी ही स्थिति फिर से दस्तक दे रही है।
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क्या भविष्‍य में तीसरे युद्ध के होने की संभावना?

1. शनि का गोचर: जैसा कि हमने ग्रह गोचर और ग्रहणों के इतिहास से जाना कि इनका प्रभाव युद्ध को जन्म देता है। वर्तमान में भी ऐसी ही स्थिति और परिस्थिति बनी हुई है। शनि का 29 मार्च 2025 को मीन राशि में गोचर होने के बाद देश और दुनिया के हालत बदल गए हैं। शनि अगले वर्ष 2027 में जब मेष में गोचर करेगा तब यह और भी कठिन समय को जन्म देगा।
 
2. अतिचारी गुरु: जैसा कि हमें पता ही है कि बृहस्पति वर्तमान में 14 मई 2025 से अतिचारी गोचर कर रहे हैं। उनका यह गोचर 2033 तक चलेगा। तब तक यह गोचर देश और दुनिया में युद्ध को चरम पर ले जाएगा और चारों और मौसम में बहुत बड़े बदलाव कर देगा। 
 
3. रौद्र संवत्सर: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वर्तमान में चल रहा 'सिद्धार्थ संवत्सर' केवल एक बड़ी त्रासदी की भूमिका तैयार कर रहा है। असली चुनौती 19 मार्च 2026 से शुरू होगी, जब 'रौद्र नामक संवत्सर' का उदय होगा। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह समय अपने साथ भीषण विनाश और नरसंहार लेकर आ सकता है। मध्य एशिया में जारी हिंसा की लपटें दक्षिण एशिया तक पहुंचने की आशंका है, जिससे पूरी दुनिया में भय का वातावरण बनेगा।
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4. छह ग्रहण: हाल ही में वर्ष 2020 में कुल 6 ग्रहण हुए थे (2 सूर्य ग्रहण और 4 चंद्र ग्रहण) जो ज्योतिषीय और वैश्विक उथल-पुथल की दृष्टि से काफी चर्चा में रहा था। इस ग्रहण के बाद से ही देश और दुनिया का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य बदल गया है। तभी से दुनिया अब तक संभल नहीं पाई है। 
 

विश्व युद्ध: कारण और विस्तार

विश्व युद्ध कोई अचानक होने वाली घटना नहीं, बल्कि वर्षों के राजनीतिक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक विफलता का परिणाम होता है। इसके मुख्य कारकों में देशों के बीच सैन्य गठबंधन, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं, संसाधनों के लिए होड़, उग्र राष्ट्रवाद, उग्र साम्यवाद  और हथियारों का जमावड़ा शामिल है। जब बातचीत के जरिए समाधान नहीं निकलता, तो एक छोटा क्षेत्रीय विवाद भी वैश्विक संघर्ष का रूप ले लेता है।
 
हालाँकि इसे 'विश्व युद्ध' कहा जाता है, लेकिन इसमें दुनिया का हर देश सीधे तौर पर शामिल नहीं होता। कई देश तटस्थ रहते हैं, लेकिन अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के कारण प्रमुख महाद्वीपों के प्रभावशाली देश इसमें मुख्य भूमिका निभाते हैं। भले ही कोई देश युद्ध में न लड़े, लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक दुष्प्रभाव पूरी दुनिया को झेलने पड़ते हैं। वर्तमान का समय इसी तरह का है।
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