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नज़रिया: 'जीती हुई लड़ाई में पिछड़ने लगी है बीजेपी'

Webdunia
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016 (13:24 IST)
‏- शरद गुप्ता (वरिष्ठ पत्रकार)
ऐसा माना जाता है कि उत्तर प्रदेश का सियासी मिज़ाज ही देश का भविष्य तय करता है। जब यूपी में कांग्रेस की तूती बोलती थी तो केंद्र में भी उसी की सरकार बनती रही। 1989 में कांग्रेस के सितारे तभी गर्दिश में चले गए जब वह यूपी में हारी। इसी तरह देश में बीजेपी के उत्थान की मुख्य वजह उसे उत्तर प्रदेश में मिली सफलताएं हैं।
इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी ने सहयोगी पार्टी (अपना दल) के साथ मिल कुल 80 में से 73 सीटें जीतीं, तो लगा कि ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का पलड़ा भारी जरूर रहेगा। बीजेपी को यूपी में अकेले 42.63 फ़ीसदी वोट मिले। जबकि 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने तो उनकी पार्टियां 29 फ़ीसदी वोट पाकर अपने दम पर बहुमत जुटा लाई थीं।
 
कहावत है- हाथी दुबला होगा तो चूहा नहीं बन जाएगा। यानी अगर बीजेपी को लोकसभा चुनाव में 42.63 फ़ीसदी वोट मोदी लहर की वजह से मिले थे तो विधानसभा चुनाव में अगर मान लिया जाए कि मोदी की लहर नहीं होगी तो भी उसे 30 फ़ीसदी वोट तो मिल ही जाने की उम्मीद थी।
 
2014 के बाद हुए सात विधानसभा चुनावों में बीजेपी का मत प्रतिशत सबसे ज्यादा कहीं गिरा तो वह दिल्ली में था- 13 फीसदी। हालांकि इसके बाद 33 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद बीजेपी को वहां 70 में से महज़ तीन सीटें मिल पाई थीं।
 
दिल्ली में बीजेपी का आम आदमी पार्टी के साथ लगभग सीधा मुकाबला था। लेकिन यूपी में स्थितियां भिन्न हैं। यहां बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ चतुष्कोणीय मुकाबले में होगी। यदि उसे दिल्ली की तरह 13 फीसदी कम वोट मिलें तो भी 2007 की बसपा और 2012 की सपा जैसे इस बार बीजेपी भी 30 प्रतिशत वोट पाकर सत्ता संभाल सकती थी।
 
दो महीने पहले तक स्थितियां यही थीं। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथों में ले रखी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भीड़ भरी रैलियां संबोधित कर रहे थे। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी घोषित कर चुके थे। तभी 8 नवंबर को मोदी ने 1000 और 500 के नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे पूरे देश की तरह उत्तर प्रदेश में भी छोटे और मझोले किसानों और उद्योगों पर जबरदस्त प्रतिकूल असर पड़ा। खास तौर पर गांव में, जहां लोग प्लास्टिक करेंसी या कैशलेस इकॉनोमी का मतलब ही नहीं समझते हैं और सारी अर्थव्यवस्था का आधार नकद रुपया ही है।
बैंकों में पैसा न पहुंचने से लोगों के पास कैश की बड़ी दिक़्क़त हो गई है। किसानों की धान की फ़सल बिक ही नहीं रही है। बिक रही है तो आधे दाम पर - छह सौ से सात सौ रुपए प्रति क्विंटल जबकि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य है 1400 रुपए प्रति क्विंटन।

जब पैसे नहीं हैं तो अगली फ़सल के लिए बीज कहां से आएगा और खाद कहां से? सुल्तानपुर ज़िले के किसान हरिलाल कहते हैं- ''भइया, पानी लगाय क (सिंचाई) डीज़ल कहां ले ख़रीदें। फ़सल को पाला मार रहो है।''
 
वहीं, गोमती नदी में मछली पकड़ कर गुज़ारा करने वाले मछुआरे बहोरन प्रसाद कहते हैं- "मंडी में ग्राहक नहीं है। मछली बिकने की जगह सड़ रही है। सुबह हमारा परिवार शकरकंदी उबाल कर खा रहा है और शाम को हम गांजा पीकर सो जाते हैं।" मज़दूर नेता दुर्गा प्रसाद मिश्रा दावा करते हैं कि उनके संपर्क में कई मज़दूर हैं जिन्हें नौ नवंबर के बाद या तो काम नहीं मिला है और अगर मिला है तो मज़दूरी नहीं मिली है।
 
जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी और सरकार की मजबूरियों की लाख दुहाई के बावजूद उन्हें लोगों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर दंगे जैसी स्थितियां बन गई हैं। पुलिस को कहीं लाठी चार्ज करना पड रहा है तो कहीं हवाई फ़ायर। सांसदों के ग़ुस्से का जायज़ा पिछले सप्ताह लखनऊ में आरएसएस और बीजेपी की संयुक्त बैठक में दिखा जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में उत्तर प्रदेश के सभी सांसदों ने एक स्वर में एक ही मांग रखी कि अगर चुनाव जीतना है तो उत्तर प्रदेश के बैंकों में तुरंत धन उपलब्ध कराएं।
 
लेकिन जब पूरे देश पर ही करेंसी की समस्या हो तो अकेले उत्तर प्रदेश में उपलब्धता कैसे सुनिश्चित कराई जा सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पिछडे कुर्मियों के अपना दल से तालमेल किया था. बीजेपी के लगभग क्लीन स्वीप करने की एक वजह यह भी थी।
 
इस बार अमित शाह का प्रयास था कि उत्तर प्रदेश में ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों का गठजोड़ बनाने का था। इसीलिए उन्होंने सोहेल देव पार्टी, पाजभर, मौर्य, कुशवाहा, कुर्मी, काछी, मल्लाह आदि पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाने की जीतोड़ कोशिश की। और किसी हद तक सफल भी हुए।
 
उनका मानना था कि अगड़ी जातियां पहले ही बीजेपी के साथ हैं और अगर पिछड़ी जातियां आ जाती हैं तो विनिंग कंबीनेशन होगा। लेकिन नोटबंदी ने नके इस पूरे प्रयास पर पानी फेर दिया। इसके अलावा यदि सपा-कांग्रेस का तालमेल हो जाता है तो अल्पसंख्यक, यादव और दूसरी पिछड़ी जातियों और अगड़ी जातियों के एक हिस्सा के उनके साथ जाने की संभावना है।
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