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हिंदुओं को झूठा साबित कर रहे हैं हिंसक गौरक्षक

Webdunia
बुधवार, 10 मई 2017 (11:36 IST)
- राजेश प्रियदर्शी (डिजिटल एडिटर)
'यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है, यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं......हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है, इसका उपयोग भी हो रहा है, आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए किया जा सकता है...'
 
हरिशंकर परसाई की दशकों पुरानी रचना 'आवारा भीड़ के ख़तरे' का अंश। परसाई की लिखी सैकड़ों बातें नास्त्रेदामस की भविष्यवाणियों से कई गुना ज़्यादा सटीक हैं।
 
1984 में सिखों का क़त्लेआम करने वाली भीड़ हो या गुजरात की दंगाई भीड़, हमने भीड़ का भयावह रूप बार-बार देखा है लेकिन उसके ख़तरों को बिल्कुल नहीं समझा है। भारत में दंगों का इतिहास पुराना है, दंगे भड़कते रहे हैं, कुछ दिनों में कई जानें लेकर शांत हो जाने वाले दंगे। कई बार आंदोलन हिंसक हो जाते हैं, जाट आंदोलन की तरह।
 
ये ज़्यादा ख़तरनाक़ है : कोई चिंगारी उड़ती है, शोला भड़कता है, कोई फ़ौरी वजह होती है, पुरानी नफ़रत हिंसा की शक्ल में फूटती है लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है। इस समय देश में दंगे नहीं हो रहे लेकिन जो हो रहा है वो शायद ज़्यादा ख़तरनाक है। दंगा घटना है, मगर अभी जो चल रहा है वो एक प्रक्रिया है। जो धीरे-धीरे सामान्य होने वाली चीज़ नहीं है।
 
अख़लाक, मज़लूम, इनायतुल्ला और पहलू ख़ान जैसे नामों की सूची लंबी होती जा रही है, इन्हें जिस भीड़ ने मारा है वे दंगाई नहीं हैं, उनका एक गौरवशाली नाम है- गोरक्षक।
 
उनकी बातें सुनिए, वे समझते हैं कि वे एक महान कार्य कर रहे हैं, अब तक बेकार घूम रहे लोगों को जीवन का उच्चतम लक्ष्य मिल गया है, जब उनकी तुलना भगत सिंह से होने लगे तो वे अपने जीवन को धन्य क्यों न मानें?
 
धर्म, राष्ट्र और गौ माता की रक्षा के आदर्शों से ओतप्रोत लोगों को अपने महान लक्ष्य की ओर बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता, शुरुआती कामयाबियों और गुपचुप शाबाशियों के बाद उन्हें विश्वास हो गया है कि वे सही राह पर हैं।
 
धर्म और सत्ता की शह से पनपने वाली ये भीड़ ख़ुद को क़ानून-व्यवस्था और न्याय-व्यवस्था से ऊपर मानती है। जब उन्हें तत्काल सज़ा सुनाने के अधिकार हासिल हो चुका हो तो वे पुलिस या अदालतों की परवाह क्यों करें, या उनसे क्यों डरें?
 
साज़िश की गवाही
गोरक्षकों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की बात तो दूर, सत्ता में बैठे, यहाँ तक कि विपक्ष के किसी नेता ने पूरा मुँह खोलकर ख़ूनी भीड़ की निंदा नहीं की। बहुत दबाव हो तो कहा जाता है कि गोरक्षा होनी चाहिए लेकिन किसी को क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। हत्या करने को 'क़ानून हाथ में लेना' कहना हिंसक साज़िश में शामिल होने की गवाही देता है।
 
क्या देश के हिंदुओं को लगता है कि हिंसक गोरक्षा में कोई बुराई नहीं है, क्या सिर्फ़ इसलिए कि वे इसके शिकार नहीं होने वाले। क्या उनकी नज़र में गाय की जान इंसानी जान के बराबर और कई बार उससे ज़्यादा क़ीमती है?
 
वे शायद उस प्रवृत्ति को नहीं समझ रहे हैं जो गोरक्षकों को चला रही है, यही हिंसक भीड़ कभी अफ्रीकियों पर, कभी दलितों पर, कभी आदिवासियों पर, कभी महिलाओं पर हमले करेगी।
 
मुसलमानों से तुलना : जिस संविधान और क़ानून से हिंदुओं को अपनी सुरक्षा का भरोसा है, क्या वे गोरक्षकों को उसी के ऊपर नहीं बिठा रहे हैं? कभी नफ़रत के जुनून में और कभी नादानी में।
 
उन्हें बढ़ावा देना मुश्किल नहीं था, मगर रोकना लगभग असंभव होगा। मिसाल पड़ोस में है, जब मुजाहिद इस्लाम की रक्षा का महान कार्य कर रहे थे, समाज के एक तबक़े में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी, अब वही दहशतगर्द कहे जा रहे हैं लेकिन क्या मज़ाल है कि वे किसी के समझाने से समझ जाएँ। बहुत सारे लोग इस बात पर नाराज़ हो सकते हैं कि हिंदुओं की तुलना मुसलमानों से न की जाए, लेकिन हिंदू धर्म को शांतिप्रिय और अहिंसक मानने वालों को झूठा साबित कर रही है ये भीड़।
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