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चीन और भूटान का यह समझौता क्या भारत के लिए टेंशन है?

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BBC Hindi

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021 (08:03 IST)
राघवेंद्र राव, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली 

गुरुवार 14 अक्टूबर को चीन और भूटान के विदेश मंत्रियों ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए एक बैठक की और दोनों देशो के बीच कई वर्षों से चल रहे सीमा विवादों को सुलझाने के लिए एक थ्री-स्टेप रोडमैप के समझौते पर दस्तख़त किए।
 
ये समझौता डोकलाम ट्राई-जंक्शन पर भारत और चीन की सेनाओं के बीच 73 दिनों तक चले गतिरोध के चार साल बाद हुआ है। डोकलाम में गतिरोध तब शुरू हुआ था जब चीन ने उस इलाक़े में एक ऐसी जगह सड़क बनाने की कोशिश की थी, जिस पर भूटान का दावा था।
 
इस समझौते पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, "हमने आज भूटान और चीन के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जाने को नोट किया है। आप जानते हैं कि भूटान और चीन 1984 से सीमा वार्ता कर रहे हैं। भारत भी इसी तरह चीन के साथ सीमा वार्ता कर रहा है।"
 
इस मामले पर भूटान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि थ्री-स्टेप या तीन चरणों वाले रोडमैप पर समझौता ज्ञापन सीमा वार्ता को एक नई गति प्रदान करेगा।
 
भूटान चीन के साथ 400 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा साझा करता है और दोनों देशों ने विवाद को सुलझाने के लिए साल 1984 से अब तक 24 दौर की सीमा वार्ता कर चुके हैं।
 
भारत ने भले ही इस समझौते पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन चीन के साथ पिछले डेढ़ साल से चल रहे तनाव के चलते वो इस घटनाक्रम को नज़रअंदाज़ करने की स्थिति में नहीं है।
 
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किस इलाक़े पर है चीन की नज़र?
जिन दो इलाक़ों को लेकर चीन और भूटान के बीच ज़्यादा विवाद है, उनमें से एक भारत-चीन-भूटान ट्राइजंक्शन के पास 269 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा और दूसरा भूटान के उत्तर में 495 वर्ग किलोमीटर का जकारलुंग और पासमलुंग घाटियों का इलाक़ा है।
 
चीन भूटान को 495 वर्ग किलोमीटर वाला इलाक़ा देकर उसके बदले में 269 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा लेना चाहता है।
 
भारतीय सेना के सेवानिवृत मेजर जनरल एसबी अस्थाना सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं। उनका मानना है कि चीन हमेशा अपने से कमज़ोर देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्ते बनाने की कोशिश करता रहा है ताकि वो अपने आर्थिक और सैन्य दबदबे से उन देशों को प्रभावित करके अपने फ़ायदे के फैसले करवा सके।
 
वे कहते हैं, "भूटान की उत्तरी सीमा पर जिन दो इलाक़ों पर चीन का दावा है, इनमें से एक चुम्बी घाटी का है, जिसके नज़दीक डोकलाम में भारत और चीन के बीच गतिरोध हुआ था। चीन, भूटान से वो चुम्बी घाटी वाला इलाक़ा मांग रहा है और बदले में उसे एक दूसरा विवादित इलाक़ा देने को तैयार है, जो चुम्बी घाटी के इलाक़े से कहीं बड़ा है। चीन जो इलाक़ा मांग रहा है, वो भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के क़रीब है।"
 
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे चिकन्स नैक भी कहा जाता है, वो भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वो पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचने के लिए भारत का मुख्य रास्ता है और अगर चीनी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के क़रीब आते हैं तो यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा क्योंकि यह पूर्वोत्तर राज्यों से कनेक्टिविटी के लिए ख़तरा बन सकता है।
 
मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं, "चिकन्स नैक का इलाक़ा भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इस इलाक़े में अगर चीन को थोड़ा सा भी लाभ होता है तो वो भारत के लिए बहुत बड़ा नुकसान होगा। चीन, भूटान के साथ सौदा करने की कोशिश कर रहा है। और ये सौदा भारत के हित में नहीं होगा।"
 
'मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश'
डॉक्टर अल्का आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के पूर्वी एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। उनका मानना है कि इस घटनाक्रम से भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं।
 
वे कहती हैं, "डोकलाम का विवाद होने के बाद चीन ने मुहिम चलाई कि वो भूटान से संपर्क करे और सीमा के बारे में बात करे। ये देखा गया कि चीन की तरफ़ से इस बारे में काफ़ी पहल हो रही थी। अब चीन की कोशिश यही है कि वो भूटान के साथ सीधे-सीधे कोई समझौता कर ले। इससे भारत के समस्या बढ़ जाएगी क्योंकि फिर ये कहा जाएगा कि अब तो चीन ने सब के साथ समझौता कर लिया और सिर्फ़ भारत ही बचा है तो ऐसा क्यों है? उस तरह से एक मनोवैज्ञानिक दबाव बन जाएगा।"
 
प्रोफ़ेसर आचार्य के मुताबिक़, "भारत के लिए चिंता की बात ये भी होगी की डोकलाम के पास जहाँ तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं, उस ट्राई-जंक्शन पर किस तरह का समझौता होगा।"
 
वे कहती हैं कि इस सब को देखा जाए तो स्थिति थोड़ी सी नाज़ुक है और भारत को इस पर क़रीब से नज़र रखनी होगी।
 
भूटान के लिए असमंजस?
क्या ये ताज़ा घटनाक्रम चीन और भारत के बीच चल रहे तनाव के चलते भूटान के लिए एक असमंजस की स्थिति पैदा करता है?
 
प्रोफ़ेसर आचार्य कहती हैं कि ये तो साफ़ है कि भारत और भूटान के संबंध काफ़ी गहरे हैं और भूटान का भारत की तरफ़ ही ज़्यादा झुकाव है। "भारत के विदेश मंत्रालय से अच्छा ख़ासा पैसा भूटान को जाता है। आर्थिक रूप से भारत भूटान की बहुत मदद करता है और भारत ने यही कोशिश की है चीन भूटान में ज़्यादा दख़ल न दे पाए। चीन भी इस बात की आलोचना करता है कि भारत भूटान को अपने कब्ज़े में रखना चाहता है। ये बात उन्होंने कई बार साफ़-साफ़ कही है।"
 
लेकिन प्रोफेसर आचार्य के मुताबिक़ चूंकि भूटान एक छोटा लैंड-लॉक्ड देश है तो स्वाभाविक है कि वो नहीं चाहेगा कि चीन के साथ उसका रिश्ता ही न हो। वे कहती हैं, "भूटान भी चाहेगा की उसका चीन से सीमा विवाद सुलझ जाए जिसके बाद वो चीन से एक आर्थिक रिश्ता बनाना शुरू कर सकता है। तो एक तरह से यह अपने विकास के बारे में एक स्वतंत्र देश के विचारों के बारे में भी है। भूटान भारत और चीन के बीच में एक तरह से फंसा हुआ है, वो नहीं चाहेगा कि उसे इस तरह की स्थिति में डाला जाए कि उसे भारत और चीन में से किसी के साथ और किसी के ख़िलाफ़ देखा जाए।
 
प्रोफ़ेसर आचार्य कहती हैं कि भूटान एक ऐसा देश है जो जीडीपी के बजाय ग्रॉस नेशनल हैपीनेस इंडेक्स की बात करता है और उसका देशों के बीच की पावर-पॉलिटिक्स में कोई दखल ही नहीं है।
 
उनका मानना है कि भारत को भूटान की संवेदनशीलता को ध्यान में रखना होगा और अगर चीन भूटान के साथ ये पहल कर रहा है तो भारत की कोशिश यही होनी चाहिए कि वो भूटान के साथ लगातार बातचीत करता रहे ताकि उसे ये पता रहे की चीन के साथ उसकी बातचीत किस दिशा में जा रही है।
 
चीन की मंशा
वहीं दूसरी तरफ मेजर जनरल अस्थाना का मानना है कि ये चीन की दबाव बनाने की रणनीति हैं। वे कहते हैं, "चीन की रणनीति बिना लड़ाई लड़े जीतने की है। वो युद्ध नहीं चाहता है और इसलिए इसकी रणनीति में दबाव, प्रचार, धमकी और पड़ोसियों को प्रलोभन देना शामिल हैं।"
 
उनका कहना है कि चीन का अंतिम उद्देश्य ये है कि भारत पूर्वी लद्दाख में चल रहे गतिरोध के बारे में बात करना बंद कर दे और दोनों देशों के बीच पहले की तरह व्यापारिक गतिविधियां शुरू हो जाएं। चीन लद्दाख में मौजूदा स्थिति बनाए रखना चाहता है। लेकिन भारत झुक नहीं रहा है इसलिए चीन दूसरे क्षेत्रों में दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
 
अस्थाना कहते हैं कि अगर भारत सतर्क नहीं रहता तो जल्द ही चुंबी घाटी तक चीन की एक रेल लाइन पहुँच जाएगी। वे कहते हैं, "चीन के पास पहले से ही यातुंग तक रेल लाइन की योजना है और यातुंग चुंबी घाटी के मुहाने पर है। इसलिए अगर भारत सावधान नहीं रहता और चीन भूटान के साथ समझौता करने में कामयाब हो जाता है तो चुंबी घाटी में उसका कोई प्रभाव नहीं रहेगा।
 
उनके मुताबिक़ इस इलाक़े में भारतीय सेना की तैनाती सबसे मज़बूत है क्यूंकि वो ऊंचाइयों पर तैनात हैं, इसलिए चीन भले ही सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सेंध न लगा पाए लेकिन ट्राईजंक्शन वाले इलाक़े में पहुँच जाने से उसे सामरिक फ़ायदा हो सकता है।

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