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बिहार में भाजपा पर भारी पड़ रहे हैं बाहरी मुद्दे

अनिल जैन
शनिवार, 24 अक्टूबर 2015 (17:05 IST)
पटना। बिहार के विधानसभा चुनाव में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करना भाजपा को बहुत भारी पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने की वजह से यह चुनाव मुद्दों के लिहाज से महज बिहार का न होकर अखिल भारतीय स्तर का हो गया है। देश के किसी हिस्से में घट रही घटना सीधे-सीधे बिहार के चुनाव में मुद्दा बन रही है। 
हरियाणा के फरीदाबाद में दलित परिवार को जिंदा जलाने की घटना हो या उत्तर प्रदेश के दादरी की घटना, गुजरात के पाटीदार आरक्षण का मामला हो या आरक्षण पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कानून का सुप्रीम कोर्ट में रद्द होना हो या बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ साहित्यकारों के सम्मान लौटाने का मामला या फिर महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के बीच मची कलह- ये सारे मुद्दे बिहार के चुनाव में जोरशोर से उठाए जा रहे हैं और भाजपा को रक्षात्मक होकर सब पर जवाब देना पड़ रहा है। इस तरह बिहार का चुनाव बता रहा है कि किसी विधानसभा के चुनाव का फलक कितना व्यापक हो सकता है।
 
भाजपा के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद पांच राज्यों- महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के विधानसभा चुनाव हुए। ये सभी चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए। लेकिन बिहार का चुनाव जितना स्थानीय है, उतना ही अखिल भारतीय स्तर का भी हो गया है। इसकी बड़ी वजह यही है कि भाजपा यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कंधे पर सवार होकर लड़ रही है। अगर उसने किसी स्थानीय नेता का चेहरा आगे किया होता तो शायद बिहार से बाहर के मुद्दे ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाते। 
 
जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव भी इस बात को मानते हैं। उनका कहना है कि जब भाजपा यह चुनाव प्रधानमंत्री के रूप में अपने सबसे बड़े अखिल भारतीय चेहरे को आगे रखकर लड़ रही है तो फिर स्वाभाविक रूप से चुनाव में अखिल भारतीय मुद्दे भी उठेंगे ही। खबर तो यह भी है कि दुनिया के तमाम विकसित देशों के दूतावासों और उच्चायोगों में भी बिहार के चुनाव पर नजर रखी जा रही है। तमाम देशों के राजनयिक मान रहे हैं कि बिहार के नतीजों से देश के आर्थिक सुधार के फैसले प्रभावित होंगे।
 
बहरहाल, बिहार के चुनाव का फलक अखिल भारतीय होना भाजपा के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। महागठबंधन के नेता नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव हर मुद्दे पर भाजपा को घेर रहे हैं और भाजपा के नेताओं को हर मसले पर जवाब देना पड़ रहा है। हरियाणा के फरीदाबाद मे एक दलित परिवार को जिंदा जलाया गया तो बिहार में राजनीति होने लगी। 
 
महागठबंधन के नेताओं ने कहा कि यह भाजपा राज की हकीकत है। मजबूरी में भाजपा के सहयोगी रामविलास पासवान को भी हरियाणा की भाजपा सरकार के खिलाफ तीखा बयान देना पड़ा। हालांकि सुशील मोदी ने पलटवार करते हुए लालू यादव के शासन में हुए दलितों के कई नरसंहारों की याद दिलाई, लेकिन मुश्किल यह है कि अतीत की बातों के मुकाबले ताजा घटनाक्रम लोगों को ज्यादा अपील करता है।
 
चाहे दादरी की घटना हो या हरियाणा की दोनों अप्रत्याशित हैं। इनके पीछे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक टकराव की स्थितियां हैं, जिनके कारण ऐसी हिंसक वारदातें हुईं। फिर भी ठीकरा भाजपा के सिर फूटा है। भाजपा की मुश्किल यह है कि घटनाओं पर उसका वश नहीं है। इसलिए उसके पास यह दुआ करने के अलावा कोई चारा नहीं है कि उसे नुकसान पहुंचाने वाली कोई और घटना अब न हो।
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