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'गुजराती मोदी' को 'बिहारी मोदी' पर भरोसा नहीं?

अनिल जैन
सोमवार, 2 नवंबर 2015 (19:32 IST)
पटना। बिहार विधानसभा के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने भले ही मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया हो, लेकिन अकेले भाजपा के भीतर ही लगभग आधा दर्जन नेता अपने को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। इन नेताओं में एक नाम सुशील कुमार मोदी का भी है। 
 
बिहार भाजपा में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जिनके घरों के बाहर बड़ी चमचमाती गाड़ियां, दर्जनों समर्थक और खुद के साथ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की तस्वीर वाले बैनर न दिखे, लेकिन सुशील मोदी की पहचान ऐसे नेताओं से जरा हटकर है। वे पिछले करीब दो दशक से बिहार में भाजपा का प्रतिनिधि चेहरा बने हुए हैं। 
 
इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि भाजपा के स्थानीय नेताओं में सुशील मोदी का कद सबसे बड़ा और छवि सबसे साफ है। शायद यही वजह है कि प्रदेश में भाजपा के चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें प्रचार के लिए एक हेलीकॉप्टर दे रखा है और चुनावी रणनीति को लेकर वे उनके साथ नियमित मंत्रणा भी करते हैं।
 
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले सुशील मोदी की राजनीति में शुरुआत छात्रनेता के रूप में जेपी आंदोलन से हुई। वे साढ़े सात साल तक राज्य के उप मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री भी रहे हैं। इस नाते चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले तक माना जा रहा था कि पार्टी उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव मैदान में उतरेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 
 
महाराष्ट्र की एक ईसाई महिला से प्रेम विवाह करने वाले सुशील मोदी वैश्य समुदाय से आते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को लेकर भाजपा नेतृत्व को शायद यह हिचक रही कि वे बिहार की राजनीति में उस प्रभावी जातीय समीकरण में फिट नहीं बैठते जिसमें नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव बहुत भारी माने जाते हैं। फिर भाजपा को इस बात का भी अहसास है कि बिहार के अंदरुनी इलाकों में नीतीश कुमार के खिलाफ विरोध की कोई प्रभावी लहर नहीं है और यह चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार का है। ऐसे में किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
 
लेकिन सुशील मोदी को परे रखने की यही एकमात्र वजह नहीं है। भाजपा के कुछ नेता बताते हैं कि सुशील मोदी के सीवी यानी बायोडाटा में एक बड़ी कमी है। दो साल पहले जब भाजपा के भीतर और बाहर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर दो धड़े बने हुए थे तो बिहार के मोदी गुजरात के मोदी के पाले में नहीं थे। तब से ही नरेंद्र मोदी उनकी वफादारी को संदिग्ध मानते हैं।
 
बहरहाल, बिहार का चुनाव अपने अंतिम दौर में है। सुशील मोदी के समर्थकों का मानना है कि अगर भाजपा जीतती है तो छाछ और सत्तू के सहारे दिन-रात चुनाव प्रचार में जुटे सुशील मोदी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को नजरअंदाज करना पार्टी नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा।
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