टाइगर 3 मूवी रिव्यू: मनोरंजन और रोमांच की कमी से जूझता टाइगर का मिशन

समय ताम्रकर
आदित्य चोपड़ा ने जब 2012 में एक था टाइगर बनाई थी तब सोचा नहीं था कि सीक्वल भी बनाया जाएगा, लेकिन सीक्वल का चलन चल पड़ा तो उन्होंने 2017 में टाइगर जिंदा है नामक फिल्म बनाई। हॉलीवुड से प्रेरणा लेकर उन्होंने स्पाई यूनिवर्स बना डाला। पठान में टाइगर की एंट्री करा दी और अब टाइगर 3 में पठान से एक्शन सीक्वेंस करा दिया। वॉर के रितिक रोशन भी नजर आते हैं। छोटे-छोटे कैमियो हैं, जो महज कहानी को जोड़ने के सतही प्रयास नजर आते हैं। इन किरदारों से कहानी में बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। 
 
पठान में बॉस के रूप में डिंपल कपाड़िया थीं तो टाइगर 3 में उनकी जगह रेवती ने ले ली। एक एजेंट गोपी को बचाने की जवाबदारी टाइगर को दी जाती है जिससे कुछ सीक्रेट्स टाइगर को मिलते हैं। 
 
नए विलेन आतिश रहमान (इमरान हाशमी) की एंट्री होती है जिसके तार ज़ोया (कैटरीना कैफ) के अतीत से जुड़े होते हैं। ज़ोया और टाइगर को आतिश ऐसे जाल में उलझाता है कि दोनों को बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता है।
 
आदित्य चोपड़ा की कहानी पर श्रीधर राघवन का स्क्रीनप्ले है। स्टोरी की बात की जाए तो बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव इसमें नहीं है। यह रूटीन सी कहानी है जिसमें एजेंट एक मिशन पर है। आतिश किस तरह से टाइगर और ज़ोया को उलझा देता है यही एकमात्र बड़ा टर्न कहानी में नजर आता है। लेकिन ये टर्न ऐसा भी नहीं है कि दिमाग घुमा दे।

 
श्रीधर राघवन के स्क्रीनप्ले में घटनाक्रमों को तेजी से घटते हुए दिखाया है ताकि दर्शकों को ज्यादा सोचने का मौका नहीं मिले। लेकिन कुछ लम्हें ऐसे भी हैं जो दर्शकों को कन्फ्यूज करते हैं। एक एजेंट के मिशन में ऐसा रोमांच होना चाहिए कि दर्शक अपनी सीट पर चिपके रहे, वो रोमांच फिल्म में नदारद है। टाइगर स्क्रीन पर कई कारनामे करता है, लेकिन दर्शकों पर इसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं होता। 
 
फिल्म में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। जब रोमांच कम होता है तो दर्शक लॉजिक की बात करने लगते हैं। लार्जर देन लाइफ मूवीज़ तब ही अच्छी लगती है जब दर्शक किरदार और फिल्म से कनेक्ट रहता है और फिल्म में यह बात मिसिंग है। 
 
पाकिस्तान वाला लंबा क्लाइमैक्स अविश्वसनीय है। शाहरुख खान की 'पठान' में भी कई अविश्वसनीय सीक्वेंसेस थे, लेकिन फिल्म में मनोरंजन और इमोशन के तत्व हावी थे इसलिए वो फिल्म ज्यादा मनोरंजक लगी। 'टाइगर 3' में बढ़िया एक्शन सीक्वेंसेस और उम्दा प्रस्तुतिकरण है, लेकिन एंटरटेनमेंट गायब है जिससे 'ब्लॉकबस्टर' वाला मजा फिल्म देखते समय नहीं आता।

 
फिल्म के पहले हाफ का शुरुआती आधा घंटा बोरिंग और सुस्त है। धीरे-धीरे फिल्म में रफ्तार आती है। दूसरे हाफ में क्लाइमैक्स बहुत जल्दी शुरुआत हो जाता है और ढेर सारा एक्शन और शाहरुख खान का कैमियो इस हिस्से के हाइलाइट्स हैं। लेकिन क्लाइमैक्स पूरी तरह से आश्वस्त नहीं करता और लंबा खींचा गया है। 
 
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बचाने के लिए टाइगर का जी जान एक कर देना भी कई दर्शकों को खल सकता है। फिल्म में कॉमेडी, रोमांस, इमोशन और जोरदार डायलॉग्स की कमी महसूस होती है।  
 
निर्देशक मनीष शर्मा ने फिल्म को स्टाइलिश रखा है और शानदार एक्शन से अपने प्रस्तुतिकरण को संवारा है। लेकिन मनोरंजन वाले मूल मुद्दे से फिल्म भटकती नजर आती है। इमोशन कम होने के कारण एक्शन दृश्य भी दर्शकों को बहुत ज्यादा आकर्षक नहीं लगते हैं।
 
शाहरुख खान की उपस्थिति फिल्म के स्टारडम को बढ़ाती है। लेकिन उनका रोल उसी तरह लिखा गया है जैसा सलमान का पठान में लिखा गया था। 
 
सलमान खान में एनर्जी की कमी नजर आई। किरदार में जो जोश चाहिए था वो नदारद था। कैटरीना कैफ के लिए एक टॉवेल वाला एक्शन सीक्वेंस डिजाइन किया गया जिसमें उन्होंने जोरदार स्टंट्स दिखाए। इसके अलावा उनके पास करने ज्यादा नहीं था। 
 
इमरान हाशमी बोरिंग विलेन लगे। जो बिना एक्सप्रेशन दिए सिर्फ डायलॉग बोलता रहता है। वे कभी भी खूंखार नजर नहीं आए और उनके किरदार पर लेखक ने ज्यादा मेहनत नहीं की। कुमुद मिश्रा, रेवती, सिमरन, विशाल जेठवा, रणवीर शौरी अच्छे एक्टर्स हैं, लेकिन उनके रोल ठीक से लिखे नहीं गए।  
 
अनय गोस्वामी की सिनेमाटोग्राफी ऊंचे दर्जे की है। एक्शन सीन उन्होंने कमाल के शूट किए हैं। तकनीकी रूप से फिल्म बेहद सशक्त है। फिल्म में दो गाने हैं जो सुने और देखे जा सकते हैं। 
 
कुल मिलाकर टाइगर 3 में एक्शन, स्टाइल और शैली है, लेकिन मनोरंजन की कमी है। 

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