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Lockdown में कायम है जोश, 76 की उम्र में 16 घंटे सक्रिय रहते हैं कोठारी

डॉ. रमेश रावत
सोमवार, 4 मई 2020 (12:14 IST)
7 जून 1944 को जोधपुर में जन्मे देश के प्रख्यात एवं वयोवृद्ध पत्रकार कल्याणसिंह कोठारी परिचय के मोहताज नहीं है। अपने जीवन के 76 बसंत देख चुके कोठारी ने अपने बचपन से लेकर युवा अवस्था तक अध्ययन एवं अनेक कार्ययोजनाओं में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। वहीं, दूसरी ओर जीवन की परवाह किए बिना अनेक प्रकार की पत्रकारिता की है। इनमें भारत-पाकिस्तान के युद्ध के समय आप जब वॉर जर्नलिस्ट के रूप में जोधपुर से खबरें लिख रहे थे तब कुछ मीटर की दूरी पर बम के धमाकों की आवाज सुनाई देती थी, जो आज भी आप के कानों में गूंजती है। यह सब आपके संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी को बयां करती है।
 
इतना ही नहीं यु़द्ध के समय बंकरों में रहकर सीमित संसाधनों के चलते भूखे-प्यासे रहकर भी आपने दिन बिताए एवं जान जोखिम में डालकर पाठकों के लिए युद्ध की स्थितियों का शब्दों के माध्यम से चित्रांकन कर जो कार्य किया वह न केवल काबिले तारीफ है बल्कि प्रेरणास्पद भी है। आप के कार्यानुभव से सैकड़ों पत्रकार, मीडिया शिक्षक, मीडिया शोधार्थी एवं विद्यार्थी लाभांवित हो चुके हैं। आप पर लिखी गई पुस्तक एवं डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'मीडिया मेकर्स ऑफ राजस्थान- कल्याणसिंह कोठारी' ने काफी सुर्खियां बटोरीं तो आप पर बनी फिल्म एवं पुस्तक को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्‍स एवं एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी शामिल करने से रोक नहीं पाया।
 
इतना ही नहीं करीब पांच साल पहले ऑल इंडिया मीडिया एज्यूकेटर्स कॉन्फ्रेंस की नींव भी आपने देश के प्रख्यात मीडिया शिक्षक डॉ. संजीव भानावत के साथ मिलकर रखी। जिसमें चार संस्करणों में करीब 1200 से अधिक मीडिया शिक्षकों, मीडिया प्रोफेशनल्स ने शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं। 
 
आप 76 साल की उम्र में जोश से लबरेज रहते हुए 16 घंटे काम करते हैं। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के इस दौर में भी आपने जिंदगी को मजबूती से थामा हुआ है एवं आत्मविश्वास से लबरेज होकर लॉकडाउन के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए बच्चों, युवाओं, प्रौढ़, बुजुर्गों, पत्रकारों, अधिकारियों आदि का प्रेरणा स्त्रोत बने हुए हैं। 
कोठारी इं‍जीनियर बनना चाहते थे, लेकिन गणित अच्छी नहीं होने के कारण इसे जारी नहीं रख पाए और आर्ट्‍स में एडमिशन ले लिया। आगे चलकर वकालत भी की एवं पत्रकारिता में अपना करियर बनाने का निश्चय किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में युद्ध पत्रकारिता, विधि पत्रकारिता, राजनैतिक पत्रकारिता, विकासात्मक पत्रकारिता, बाल संरक्षण एवं पंचायत पत्रकारिता, यूएन बॉडीज एवं सिविक पत्रकारिता, सिटीजन जर्नलिज्म, खोजी पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, सांस्कृतिक एवं एतिहासिक स्थल पत्रकारिता, स्वास्थ्य पत्रकारिता आदि में आपका अनूठा योगदान रहा है। 
 
लोक संवाद संस्थान-बाल संरक्षण एवं मीडिया एडवोकेसी संस्थान में भी आप सचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं। पत्रकारिता के बाद सफल जनसंपर्ककर्मी, मीडिया सलाहकार के रूप में आपने देश-विदेश की अनेक संस्थाओं में न केवल सेवाएं दीं अपितु मार्गदर्शन भी किया है। आपको विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने माणक अलंकरण से भी सम्मानित किया था। पत्रकारिता के क्षेत्र में रहते हुए आपने अमेरिका, यूरोप एवं दुबई की यात्राएं कीं एवं वहां के शैक्षणिक संस्थानों में भ्रमण भी किया। राजस्थान विश्वविद्यालय के हैल्थ प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में जनसंचार केंद्र में आपने काम किया है। 
 
16 घंटे सक्रियता :  कोठारी ने बताया कि सुबह 6 बजे उठकर भगवान का नाम लेते हैं। इसके बाद व्यायाम कर अदरक की चाय पीते हैं। इसके बाद दैनिक कार्यों से निवृत होकर डिजिटल माध्यम से करीब 2 घंटे तक 7 से 8 अखबारों का अध्ययन करते हैं। इसके बाद में नाश्ता आदि से निवृत्त होकर मेल चैक करते हैं और अगले कार्यों की योजना बनाते हैं। 
लॉकडाउन में किए कई कार्य : लॉकडाउन के दौरान आप एक वेबीनार भी करवा चुके हैं। वर्तमान में आप रूपायन संस्थान का कैटलॉग तैयार कर रहे हैं। यह कैटलॉग राजस्थानी फॉक म्यूजियम पर है। राजस्थानी फोक आर्टिस्ट्‍स को कैसे मदद दे सकते हैं, इसके लिए क्राउड फंडिंग के लिए एक प्रोजेक्ट तैयार कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट की सफलता से बाड़मेर, जैसलमेर एवं जोधपुर के जो गरीब कलाकार रूपायन संस्थान से जुड़े हुए है उनके भरण-पोषण के लिए एवं उनके लिए दुनिया के लोगों से छोटी-छोटी आर्थिक मदद के लिए फंडिंग का काम कर रहे हैं। 
 
कोठारी ने बताया कि खाना खाने के बाद वे परिजनों के साथ मिलकर कैरम खेलते हैं, ताश खेलते हैं। इसके साथ ही वे जुलाई-अगस्त के माह में पांचवी ऑल इंडिया मीडिया एज्यूकेटर्स कॉन्फ्रेंस की तैयारी भी कर रहे हैं। इसके लिए आप देश के विभिन्न मीडिया संस्थानों के मीडिया शिक्षकों, मीडिया प्रोफेशनल्स के साथ मिलकर तैयारी भी कर रहे हैं। समय मिलने पर पद्मश्री विजयदान देथा की पुस्तकों का अध्ययन कर रहे हैं। 
उन्होंने बताया कि वे इस समय का उपयोग अपनी पोती को भी मोटीवेशनल कहानियां सुनाने के लिए भी कर रहे हैं। वे इस दौरान अमेरिका में रह रही अपनी बेटी से फोन पर हालचाल लेना नहीं भूलते। कोठारी ने बताया कि उनकी बेटी अमेरिका में लोगों के लिए घर में ही मास्क बनाकर वितरित भी कर रही है।
 

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