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किस तरह सोशल मीडिया बदल रहा है आपकी सोच, विरोधी से कैसे बनते हैं समर्थक?

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हमें फॉलो करें सिर पकडे हताश व्यक्ति, हाथ में मोबाइल और कैप्शन में सोशल मीडिया ने बंद कर दिया है दिमाग

WD Feature Desk

, बुधवार, 28 जनवरी 2026 (14:26 IST)
Social media algorithms: जब से सोशल मीडिया ने वास्तविक दुनिया में प्रवेश करके लोगों के जीवन और सोच को वास्तविकता के धरातल से उटाकर वर्चुअल बना दिया है तब से सच की हत्या हो गई है। अब सच सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया का प्रोपेगेंडा और एल्गोरिदम है। यह लोगों को खुद से सोचने को रोककर अपनी सोच के अनुसार निर्णय लेने के लिए मजबूर करता है। चलिए जानते हैं कैसे?
 

सत्ता परिवर्तन के पीछे सोशल मीडिया का प्रोपेगेंडा:

1. 2001 में फिलीपींस में दुनिया की पहली सोशल मीडिया क्रांति हुई जिसे एडसा II कहा गया। लाखों लोगों ने एक-दूसरे को मैसेज भेजकर प्रदर्शन के लिए बुलाया, जिससे राष्ट्रपति जोसेफ एस्ट्राडा की सत्ता का तख्तापलट हो गया। 
2. इसके बाद 2011 में सोशल मीडिया के माध्यम से अरब स्प्रिंग की शुरुआत हुई। इसे 'फेसबुक और ट्विटर क्रांति' कहा गया। 
3. सन् 2013 में सोशल मीडिया के माध्यम से मिस्र में तख्तापलट हुआ था। इसी क्रम में लीबिया और यमन में भी यही हुआ।
4. श्रीलंका में अरागाल्या आंदोलन (2022), बांग्लादेश और नेपाल में जेन जी का आंदोलन यह सभी सोशल मीडिया के माध्यम से हुआ।
5. भारत में भी अब सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों का परसेप्शन बदला जा रहा है।
 

सोशल मीडिया: एक आभासी 'इको चैंबर'

सोशल मीडिया वह मंच प्रदान करता है जहां सूचनाएं बिना किसी फिल्टर के तेजी से फैलती हैं। यह वैचारिक ध्रुवीकरण का मुख्य आधार बन गया है।
 
इको चैंबर (Echo Chambers): यहाँ लोग केवल उन्हीं समूहों या व्यक्तियों से जुड़ते हैं जो उनकी विचारधारा का समर्थन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति को लगता है कि उसकी सोच ही 'सार्वभौमिक सत्य' है।
 
संवाद का अंत: यह मंच विपरीत विचारधारा वाले लोगों से स्वस्थ चर्चा करने के बजाय उन्हें ब्लॉक करने या उन पर हमला (Trolling) करने की सुविधा देता है, जिससे वास्तविक संवाद पूरी तरह बंद हो जाता है।
 

एल्गोरिदम: कैसे यह आपकी सोच को बदलने की रखता है क्षमता 

एल्गोरिदम: एल्गोरिदम वह अदृश्य गणितीय कोडिंग है जो बैकग्राउंड में काम करती है और यह तय करती है कि आपकी स्क्रीन पर क्या दिखेगा।एल्गोरिदम आपकी पसंद और नापसंद को ट्रैक करता है। यदि आप किसी नेता या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में वीडियो देखना शुरू करते हैं, तो एल्गोरिदम आपको लगातार उसी प्रकार की सामग्री परोसता रहता है और तब आप उस नेता या विचारधारा के समर्थक या विरोधी बन जाते हैं। 
 

मानसिक बदलाव का चक्र: 

1. उदाहरण के तौर पर, यदि कोई तटस्थ व्यक्ति लगातार एक ही तरफा नैरेटिव (जैसे मोदी-विरोधी या मोदी-समर्थक) वीडियो देखता है, तो एल्गोरिदम उसे उसी दिशा में इतना गहराई तक ले जाता है कि उसकी पूरी धारणा बदल जाती है।
 
2. मान लो कि आप किसी नेता के समर्थक हैं और गलती से आपके सामने उस नेता के बारे में कोई ऐसा वीडियो आ गया है जो उस नेता का तर्क या कुतर्क के माध्यम से विरोध करके उस नेता के कार्य और नीतियों को गलत साबित कर रहा है और आप इस वीडियो को पूरा देख लेते हैं तो फिर एल्गोरिदम इसी तरह के और भी वीडियो आपके सामने प्रस्तुत करता रहेगा। ऐसे में धीरे धीरे आप एल्गोरिदम के जाल में फंसकर आपका परसेप्शन कब बदल जाएगा आपको इसका पता भी नहीं चल पाएगा और आप समर्थक से विरोधी बन जाएंगे।
 
3. यह तकनीकी प्रक्रिया हमारे वैचालिक, मान्यता, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को कट्टरता में बदल देती है। इसका परिणाम यह होता है कि जहां सोशल मीडिया हमें एक बंद कमरे (इको चैंबर) में रखता है, वहीं एल्गोरिदम उस कमरे की दीवारों को और मजबूत करता जाता है, जिससे बाहर की दुनिया की सच्चाई हमें दिखना बंद हो जाती है।
 
4. सोशल मीडिया के प्रोपेगेंडा के चलते समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद टूट जाता है और अफवाहें जगह ले लेती हैं। सच से ज्यादा अफवाहें ही लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती है। किसी भी देश को विखंडित करने के लिए वर्तमान में सोशल मीडिया एक बेहतर हथियार साबित हो रहा है। यहां सच से ज्यादा झूठ और अफवाहों का जोर ज्यादा है।
 

परिणाम:

इस सबके चलते अब राजनीतिक संगठन सोशल मीडिया का उपयोग 'प्रोपेगेंडा' और 'निगरानी' के लिए करने लगे हैं। सोशल मीडिया अब लोगों के बीच नफरत फैलाने का एक नया हथियार बनता जा रहा है। सोशल मीडिया फेक न्यूज के प्रसार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। बिना जांचे-परखे शेयर की गई खबरें प्रदर्शन, विरोध, सत्ता विरोधी प्रदर्शन, दंगों, मॉब लिंचिंग और सामाजिक अस्थिरता का कारण बनती हैं। यह चुनावी प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक संस्थानों की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना पसंद करते हैं, जिससे हमारी सोच संकीर्ण हो जाती है और हम दूसरे के विचारों के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं।
 

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