Hanuman Chalisa

बहुत हो गई बड़ी-बड़ी बातें, इन 20 कामों से बचेगा पर्यावरण, जरूर पढ़ें

Webdunia
- डॉ. किसलय पंचोली
 
धरती पर निवास करने वाली विभिन्न प्रजातियों में मनुष्य के पास सर्वाधिक विकसित दिमाग है। हम में से हर कोई अपने दिमाग से कोई न कोई उपाय सोच कर धरती के क्षति ग्रस्त पर्यावरण को दुरुस्त करने में सहभागी बन पुण्य कमा सकता है। इसके लिए हम निम्न उपाय अपना सकते हैं.:-
 
* बचे हुए प्राकृतिक जंगलों को, उनकी सरहदों पर कंटीले तारों की बागड़ से घेरा जा सकता है। पेड़ों के छोटे से छोटे झुरमुट को भी इसी तरह बचाया जा सकता है। क्योंकि प्राकृतिक जंगलों का कोई विकल्प नहीं होता। 
 
* वृक्ष गणना अभियान चलाया जा सकता है। वृक्षों के तनों पर फ्लोरसेंट रंगों में अंकों की पट्टियां लगाई जा सकती हैं ताकि पता चल सके कि कहां कितने और किस प्रजाति के वृक्ष मौजूद हैं। 
 
* इस गणना कार्य हेतु रिमोट सेंसिंग की अत्याधुनिक तकनीक से धरती के चप्पे-चप्पे का "हरित मेप" बनाया जा सकता है। 
 
* बिजली और दूरभाष की समस्त लाइनों को जमीन के अन्दर संजाल बिछा कर फैला दिया जाए तो पेड़ों की केनोपी बेतरतीब कटिंग से बचाई जा सकती है जिससे उनका पूर्ण सौन्दर्य भी दिखाई दे, छाया भी अच्छी मिले और उनके फूल फल भी पूरी तरह लग पाएं। 
 
 
* जो लोग जंगलों से, छोटे या बड़े पैमाने पर अवैध लकड़ी की कटाई, ढुलाई व बेचने के धंधे में लगे हैं समाज और मीडिया अपनी ताकत का प्रयोग कर ऐसे चेहरों को बेनकाब कर सकता है ताकि चोरों का दुस्साहस कम हो। 
 
* घटती हरियाली को बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण किया जा सकता है। एक पेड़ लगाने के लिए बहुत थोड़ी जगह की जरुरत होती है। ज्यादा जरुरत इस हेतु मन बनाने की होती है। बढ़ती आबादी के अनुपात में वृक्ष लगाए जा सकते हैं। घरों के आसपास, कॉलोनी मोहल्लों के बगीचों में, सड़कों के किनारों पर, रेलवे लाईन के दोनों और, खेतों की बागड़ पर, गांवों की कांकड़ पर , पोखर के ईर्द गिर्द, नदी नालों के किनारे, पहाड़ों की ढलानों पर कहीं भी। 
 
* किसी भी पेड़ की औसत उम्र मनुष्य से अधिक होती है. यदि 'एक मनुष्य एक पेड़ लगाएं' का लक्ष्य ईमानदारी से पूरा किया जाए तो कुछ ही वर्षों में अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सकती है। 
 
* वृक्षारोपण और वृक्षरक्षण के कामों की सतत चौकीदारी और रखरखाव के लिए बेरोजगार युवकों और महिलाओं को अल्पकालिक रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। 
 
* लगाए गए वृक्षों के रक्षण के लिए यथास्थिति और यथासाधन युक्तियां जुटाई जा सकती हैं। ट्री गार्ड बनाने के लिए जरुरी नहीं कि मंहगा लोहा ही उपयोग में लाया जाए। उपलब्ध अटाले या अन्य चीजों जैसे बल्लियों, खप्पचियों, ईंट के टुकड़ों, पत्थरों, लकड़ी के पट्टों, पुराने कूलरों के जंग खाए ढांचों, लोहे या प्लास्टिक की फूटी कोठियों, सूखी कांटेदार झाड़ियों आदि से घेराबंदी कर पौधों को बचाया जा सकता है।
 
* इस कार्य को धार्मिक आस्था से जोड़ कर संस्थाएं और समर्थ लोग "पेड़ों की परवरिश के भंडारे" भी चला सकते हैं। 
 
* हर सामुदायिक स्तर पर ईमानदारी और कर्मठता से प्रयास किए जा सकते हैं। 
 
* राजनैतिक दल इसे अपने एजेंडे में शामिल करें तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। 
 
* व्यवसाय, उद्योग, अस्पताल, शिक्षण संस्थाएं इस हेतु आगे आ सकती हैं। पर्यावरण की कोरी सैद्धांतिक शिक्षा के बजाए प्रायोगिक क्रियान्वयन के तरीके जांचे, परखे और लागू किए जा सकते हैं। 
 
* विज्ञापन एजेंसी, जब बोर्ड खाली पड़े हों, पेड़ों के महत्त्व की चेतना फैलाने वाली जानकारी चौराहे-चौराहे पर डिस्प्ले करें तो जागरूकता आ सकती है। 
 
* इस बात को नुक्कड़ नाटकों, कठपुतली के खेलों, और अन्य लोककलाओं के माध्यम से भी जन जन तक पंहुचाया जा सकता है। 
 
* पुराने पेड़ों के आसपास पेवमेन्ट लगते समय थोड़ी जगह खाली छोड़ी जा सकती है जिससे उनकी जड़ें भली भांति सांस लेती रह सकें। 
 
* इमारतों की दीवालों, खम्बों, छज्जों, पर बेलें चढ़ाई जा सकती हैं या छतों पर बड़े गमलों में लगा कर नीचे लटकाई जा सकती हैं। टेरेस गार्डन को बढ़ावा दिया जा सकता है। ताकि जहां कहीं नजर जाए धूप की चकाचौंध के बजाए आंखों को हरियाली का सुकून मिले। वायुमंडल में शुद्ध आक्सीजन बढ़ें। 
 
* हम सब 'तीन आर' की नीति अपना सकते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग, पुन: उपयोग एवं बहुचक्रीकरण कर के पर्यावरण संरक्षण में महती भूमिका निभा सकते हैं। 
 
* पानी प्रबंधन, कचरा प्रबंधन, ईको आर्किटेक्ट, वाहनों का कम और सही ईंधन के साथ उपयोग, अन्य उर्जा स्त्रोतों जैसे सोलर, पवन आदि का उपयोग भी प्रकारांतर से धरती के पर्यावरण को संरक्षित करने में मददगार हो सकता है। 
 
* धरती के पर्यावरण की क्षति एक वैश्विक समस्या है। विकसित देशों पर यह दबाव बनाया जा सकता है कि धरती के पर्यावरण को आप की जीवन शैली से अधिक नुकसान पंहुचता है इसलिए पूरी पृथ्वी पर वृक्षारोपण और वृक्षरक्षण व अन्य पर्यावरण सुधारवादी कामों के आर्थिक भार को आप को अधिक उठाना चाहिए। 
 
दरअसल उपरोक्त अधिकांश प्रयास हमारे देश में हो तो रहे हैं लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। हमें अपने प्रयास और सघन करने होंगे। ऊंट के मुंह में जीरे के बदले उसे मिष्ठान खिलाने होंगे। अभी समय है अभी सब कुछ चुक नहीं गया है। अभी भी बहुत कुछ संभल और संवर सकता है. विश्व पर्यावरण दिवस पर यह शुभकामना कि धरती के पर्यावरण को संरक्षित करने वाला सूर्योदय कल ही होने वाला है। आमीन ! 

ALSO READ: विश्व पर्यावरण दिवस : क्या आप जानते हैं इतिहास...

सम्बंधित जानकारी

Show comments

जरूर पढ़ें

न विज्ञान का तर्क, न समय की मार, इंतजार के 12 साल, आज भी गुरु के 'जागने' की आस में पथराई हजारों आंखें

भारत में निपाह वायरस से हड़कंप, संक्रमण के 2 केस आए सामने, क्‍या बोला WHO

Ajit Pawar plane crash Baramati : 'ट्रैफिक जाम' ने तय किया जिंदगी और मौत का फासला, ब्रेसलेट बना आखिरी पहचान, 5 सपनों की दर्दनाक मौत

Realme P4 Power 5G भारत में लॉन्च, 10,001 mAh की 'मॉन्स्टर' बैटरी और 6500 निट्स ब्राइटनेस के साथ मचाएगा तहलका

ट्रंप को क्‍यों आई भारत की याद, क्‍या चीन को घेरने की है तैयारी, PM मोदी को भेजा 'पैक्स सिलिका' का न्‍योता

सभी देखें

नवीनतम

क्या मीडिल ईस्ट में छिड़ने वाला है महायुद्ध, ईरान को डोनाल्ड ट्रंप की लास्ट वॉर्निंग

LIVE: प्रधानमंत्री मोदी ने वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति से बात की

Imran Khan के खिलाफ जेल में ऑपरेशन 'आंखफोड़वा' , क्या अंधा करने की साजिश कर रहे हैं शहबाज और मुनीर

सुनेत्रा पवार बनेंगी महाराष्ट्र की डिप्टी CM, प्रमुख विभागों के लिए अड़ी NCP, प्रफुल्ल पटेल संभालेंगे पार्टी की कमान

ग्रामीण भारत को संपत्ति अधिकारों का उपहार, यूपी में 1 करोड़ से अधिक घरौनियों का वितरण

अगला लेख