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पुस्त‍क समीक्षा : कौआ कान ले गया

Webdunia
समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा 
विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह 90 के दशक के बदलते रंग-ढंग, रहन-सहन या उपभोगतावादी संस्कृति में तब्दील होती नई पीढ़ी की दशा का सीधा-सरल किंतु प्रभावशाली व्यंग्यात्मक विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के कारण देश में उस विकास की प्रक्रिया को समझने का मौका मिलेगा जिसमें आम आदमी की जेब देखी जाती है आदमी नहीं।
 
 
मोबाईल कंपनियां उपभोक्ता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं यह देखने लायक होता है। सैकड़ों ऑफर उपभोक्ता को दिग्भ्रमित करते हैं।  “मैंने पाया कि हर प्लान दूसरे प्लान से भिन्न है और चयन की यह प्रणाली कारगर नहीं है। हर विज्ञापन दूसरे से ज्यादा लुभावना है। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था। ऐसे सैकड़ों विकल्पों वाले आकर्षक प्लान के निर्माताओं, नव युवा एम.बी.ए. पास, मार्केटिंग मैनेजर की योग्यता का मैं कायल हो गया था।”
 
उपभोक्ता की चेतना का निर्माण सिर्फ मोबाईल कम्पनियां ही नहीं करती, बल्कि आज की मीडिया भी आम जनमानस को मुद्दों से दूर कर रही है। किडनी चोर की खबर को चैनल पर ‘सबसे पहले’ ब्रेकिंग न्यूज बना दिया जाता है। इस पर विवेक रंजन का व्यंग्य देखिए और व्यंग्य की मार- “मैं मीडिया की तत्परता से अभिभूत हूं। आशा है ऐसे प्रेरणादायी समाचार से, देश के बेरोजगार युवक, बीमार अमीर लोगों हेतु, किडनी जुटाने के इस नए व्यवसाय को अपनाने के सेवाकार्य में, अपने लिए रोजी-रोटी तलाशने की संभावना का अध्ययन अवश्य ही करेंगे। ”
 
आज के तथाकथित संसदीय नेताओं का ही नहीं, छुटभैया नेताओं का इस  व्यंग्य में बखूबी दिखाया गया है - “स्थानीय नेता जी हर चुनाव से पहले फाटक की जगह ओवरब्रिज का सपना दिखा कर वोट पा जाते हैं। लोकल अखबार को गाहे-बगाहे, फाटक पर कोई एक्सीडेंट हो जाए तो सुर्खियां मिल जाती हैं।”
 
आज देश में अस्मिता की राजनीति हो रही है। आरक्षण की मांग अब दलित, महादलित या गरीब ही नहीं वे जातियां भी कर रही हैं, जो धन-सत्ता में पहले से ही संपन्न हैं। विवेक ने इस सत्तालोभी राजनीतिक चालबाजी को अपने व्यंग्य में जगह देकर अच्छे-अच्छे की बोलती बंद कर दी है- “मेरा अभिमत है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को अनुसंधान कर, स्वयं को सबसे ज्यादा पिछड़ा सिद्ध करने के लिए तथ्य जुटा कर, ठीक चुनाव से पहले अभूतपूर्व आंदोलन कर दलित, पतित, पिछड़ा, अनुसूचित जनजातीय वगैरह घोषित करवा लेना चाहिए।”
 
भारत का अघोषित राष्ट्रीय खेल क्रिकेट अब बाजार के हवाले है। खिलाड़ी बिके और देश की जगह अब कंपनी के लिए खेलना मतलब सिर्फ पैसा ही सब कुछ है। व्यंगकार विवेक लिखते हैं कि “इस हमाम में सब नंगे हैं, वरना बिकते तो पहले भी थे, लेकिन आज इनकी बोली लगाने का मूल्यांकन ठीक नहीं। खिलाड़ियों से देशवासियों के भावानात्मक लगाव के कारण इस खेल को देखने में लगने वाले समय की कीमत भी उन्हें मिलनी चाहिए।”
 
आभासी दुनिया लोगों के व्यक्तित्व निर्माण में अहम, मैं, घमंड व्यक्तिवाद जैसी प्रवृत्तियों को भी जन्म दे रही है। नाना प्रकार की वर्चुअली दिमागी बीमारी धीरे-धीरे नव साहित्यकारों को अपनी गिरफ्त में ले रही है। विवेक ने इंटरनेट की नब्ज को बड़ी ही सूक्ष्मता से पहचाना है - “मैं हर सुबह उत्साहपूर्वक माउस क्लिक करता हूं, मुझे आशा होती है कि कुछ संपादकों के स्वीकृति पत्र होंगे, और जल्द ही मैं एक ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार बन जाऊंगा। पत्र-पत्रिकाएं मुझसे भी अवसर विशेष के लिए रचनाओं की मांग करेंगी। ” 
 
देश के कुछ लोग बौद्धिक दिवालियापन की राह पर चल रहे हैं। वे वीरों, महापुरुषों और ईश्वर तक को जाति विशेष से संबंधि‍त करने की कोशिश में लगे हैं। इतिहास से उन महामानवों को खोजा जा रहा है, जो जाति विशेष के खांचे में फिट हो सकें। शायद वे लोग कुछ हद तक सफल भी हुए और भगवान कृष्ण जो वैश्विक हैं, वे इन दिनों मेरे मोहल्ले के यादव समाज के द्वारा धर लिए गए हैं।
 
हिन्दी साहित्य में आत्मकथा का बाजार काफी बड़े पैमाने पर फैल रहा है। इससे लेखक, प्रकाशक एवं राजनीति चमकाने वाले भी बहती गंगा में नहाकर पवित्र हो जाते हैं और विवादों से मुनाफा कमाते हैं। आत्मकथाओं के उस तीसरे पन्ने को खोलने की कोशिश  व्यंग्यकार ने बहुत बेबाक तरीके से की है- “ पहले थोड़ा-सा खुद को चमकाईए, फिर अपनी डायरी को आधार बनाकर 5-10 वर्षों बाद लिख डालिए आत्मकथा।”
 
आज के दौर में अफवाहों का बाजार गर्म है। वह जोर-शोर के साथ भारतीय पटल पर सामने आया है। इन अफवाहों ने देश में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक एकता को खंडित कर रही है। कौआ कान ले गया बड़ा ही रोचक व्यंग्य है – “जैसे ही किसी ने कहा कि कौआ कान ले गया, भीड़ बिना कान चेक किए ही कान ले जाने के विरोध में धरने, आंदोलन, प्रदर्शन करती है।” 
 
कहने के लिए तो यह व्यंग्य संग्रह है, लेकिन पढ़ते हुए आपको लगेगा कि यह हमारे सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक ताने-बाने की वह गाथा है, जो निरंतर बदल रही है और यह परिवर्तन समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं। महापुरुषों का निर्माण, अंधेरा कायम रहे, फंदा उलटा बंदा सीधा जैसीव्यंग्य रचनाएं हमारे समय से संवाद करने में हमारी मदद करेंगी।
 
विवेक रंजन ने अपनी व्यंग्य शैली का निर्माण देशकाल एवं कथा के साथ निरंतर विकसित किया है जिससे उनके व्यंग में संवेदना, संवाद और यथार्थ का जीता जागता चित्रण आसानी से मिल जाता है। 
 
पुस्तक का नाम - कौआ कान ले गया 
             लेखक - विवेक रंजन श्रीवास्तव
          प्रकाशक -  सुकीर्ति प्रकाशन 
             कीमत -  60  रुपए 
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