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पुस्तक समीक्षा : कंगाल होता जनतंत्र

Webdunia
एम.एम.चन्द्रा 
 
‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है। यह संग्रह पिछले दो दशकों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का एक ऐसा दस्तावेज है, जिसने न सिर्फ लेखक की चेतना का निर्माण किया बल्कि आम जनमानस की चेतना की निर्माण प्रकिया को आसानी से समझने का प्रयास किया।

सन् 1993 से लेकर आज तक का हमारा समय वैचारिक विभ्रम, विघटन, उत्थान और पतन के दौर से गुजर रहा है। यह काव्य संग्रह मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला, जब नए रचनाकारों पर सवाल दर सवाल दागे जा रहे हैं। ऐसे समय में अनिल कुमार की रचनाएं साहित्य जगत में बहुत सी संभावनाओं को जन्म देती हैं। ‘कली रहने दो’ एक लंबी कविता है, जिसमें ‘डर’ विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है और कहता है कि-
तुम मत उगो सूरज
तुम्हारे डूबने उगने से
मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता
 
1992-93 के उस मंजर को अनिल ने बहुत ही गंभीरता से महसूस किया है, जब देश में अराजकता, सांप्रदायिकता और धार्मिक उन्माद आज की तरह ही अपनी चरम सीमा तक पहुंच गया था। तब ऐसे समय में अनिल कुमार की कविताएं अपने से संवाद करती हुई दिखाई देती हैं -  
      
ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचंड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शाश्वत है, न विगत है, न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवाद है
एकांगी सोच के नशे में
अब जागती हुई नींद आधी है
 
1990 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा भारत निर्माण, ग्लोबल विलेज, शाइनिंग इंडिया इत्यादि मुहावरों की यथास्थिति 2010 आते-आते लेखक की नजरों में एकदम साफ हो जाती है। इसी का नतीजा है कि भूमंडलीकरण का सब्जबाग और उसकी नियति अब नए तरह की सभ्यता और संस्कृति को जन्म दे रही है, जिससे कोई भी अछूता नहीं है -
 
भूमंडलीकरण के चंगुल में
बाजार का विस्तार होगा
खरीदने बेचने का व्यवहार होगा
यही सभ्यता और संस्कार होगा
भावनाओं का मोल-भाव होगा
बिकाऊ सद्भाव होगा
सारा विश्व एक गांव होगा
 
भूमंडलीकरण से जहां एक तरफ देश की रहस्यमय बीमारियों से लड़ने के लिए फाइफ स्टार जैसे अस्पताल भारतीय महानगरों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग छोटी-छोटी बीमारियों में बगैर इलाज के मर रहे हैं। निजीकरण की आंधी ने बीमारियों को भी एक अच्छा धंधा बना दिया है -
 
क्लीनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार है
दूसरे में एम.आर. है
एक दवा खाएगा
दूसरा दवा खपाएगा
 
युवा रचनाकार के सामने सही मूल्यांकन का सवाल बहुत बड़ा होता है। सही साहित्य की समझ को बनाए रखने के लिए युवा रचनाकारों को सचेत करते हुए अनिल कुमार इशारा करते हैं, कि आलोचना के सांचे बन चुके हैं। उसके झांसे में आने से बचने की आवश्यकता है -
 
ये आलोचना तो सात अंधों की जुबान है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र खंडित है
बहुत बड़ा पंडित है
 
साधु-संतो के वेश में चोर, लुटेरे, बलात्कारी, अंधविश्वासी समाज में भरे हुए हैं। वे देश की भोली-भाली जनता को अपना जाल बिछा कर फंसाती है और जनता को मूर्ख बनाने के गोरखधंधे को देश के हर कोने में फैला रही है। वे अंधविश्वासी, तार्किक परंपरा का गला घोंटने के लिए नए तौर-तरीकों से पुराने मूल्यों को जबरदस्ती थोप रहे हैं -
 
आध्यात्मिक अलगाव की बुझी राख को...
पुराने मूल्यों के नाश्ते को
नई तकनीक की गोली से पचा रहे थे
और मीडिया संविधान की धाराओं में
बड़ी ही सुरक्षित गुफा तलाश रहा था
या यों कहें कि देश चला रहा था।
 
भारतीय जनतंत्र में भीड़ के द्वारा मोर्चा, अनशन, विरोध-प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल जैसी कार्यवाही के पीछे नेताओं की हकीकत को अनिल कुमार की कविता बेनकाब ही नहीं करती, बल्कि भारतीय जनतंत्र की खोखली हो रही जमीन को और भी खोदने की काम करती है। ‘कंगाल होता जनतंत्र’ भी बाकी कविताओं की तरह लंबी कविता है, जिसमें कंगाल होते भारतीय जनतंत्र को चिन्हित किया गया है -
 
विदेशी पूंजी से छलकते हुए
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूं
 
लेखक भारतीय जनतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसकी जर-जर होती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सामने लाता है-
 
इस देश महान में, खेत में खलिहान में
बाबा के संविधान में
सिद्धांत यह है कि समानता का अधिकार है
एक वैचारिक विकार है
सामान्य में कुछ विशेष है
विशेष में अति विशेष है
बाकी अवशेष है
 
मीडिया की भूमिका जनतंत्र में चौथे स्तंभ के रूप में मानी जाती है, लेकिन देशी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ ने मीडिया के चरित्र को बदल दिया है। जहां मीडिया को जनपक्ष होना था वहीं आज मीडिया सरकार की चाटुकारि‍ता करती नजर आती है। इस व्यवहार को लेखक ने अपनी कविता के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है-
 
यह मूल्यहीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बंद पूंजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा में खांस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है...
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है...
सब मूल्य और तर्क तोड़ कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज चैनलों में हो रहा दंगा है
अखबार कैमरे की आंख से भी नंगा है...
तिकड़म तो बस यही है कि
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोपड़ी से महल बना लिया
 
भूखों, किसानों, मजदूरों के लिए भारतीय लोकतंत्र के नारों के अनुभवों को अनिल कुमार ने खूब लताड़ा है। सड़ते हुए लोकतंत्र का विकल्प अनिल कुमार प्रस्तुत नहीं करते। वे सिर्फ कंगाल होते लोकतंत्र की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक ढांचे की सच्चाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताएं दुखद अनुभव और पीड़ाओं से गुजरी हैं, लेकिन इसके बावजूद अनिल कुमार शर्मा की उम्मीद अभी भी जिंदा है। क्योंकि ‘इंकलाब अभी जिंदा है’।
 
पुस्तक का नाम  -   कंगाल होता जनतंत्र 
लेखक  का नाम  -  अनिल कुमार शर्मा
          प्रकाशक  -  विकल्प प्रकाशन 
         समीक्षक  -  एम.एम.चन्द्रा 
          कीमत    -   300 रुपये 
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