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'अकाल में उत्सव' : आम किसान की एक दुःख भरी दास्तान

Webdunia
समीक्षक - पवन कुमार     
पंकज सुबीर ने अपने पहले ही उपन्यास 'ये वो सहर नहीं' से जो उम्मीदें बोई थीं वे 'अकाल में उत्सव' तक आते-आते फलीभूत होती दिख रही हैं। नौजवान लेखक पंकज सुबीर इन अर्थों में विशिष्ट उपन्यासकार है, कि वे अपने लेखन में किसी विषय विशेष को पकड़ते हैं और उस विषय को धुरी में रखकर अपने पात्रों के माध्यम से कथ्य और विचारों का जितना बड़ा घेरा खींच सकते हैं, खींचने की कोशिश करते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे विषयवस्तु, पात्रों और भाषा का चयन बड़ी संजीदगी से करते हैं और उसमें इतिहास और मनोविज्ञान का तड़का बड़ी खूबसूरती से लगाते हैं।
 
उनके पात्र लोक भाषा का प्रयोग करते हैं, आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी भी बोल लेते हैं और वो अंग्रेजी जो आज की आम फहम जुबान है। तभी तो 'अकाल में उत्सव' के ग्रामीण पात्र जहां इंदौर-भोपाल-सिहोर जनपदों के आस-पास के क्षेत्र में बोले जाने वाली अपभ्रंश 'मालवी' भाषा में बातचीत करते हैं, वहीं कलेक्टर और ए.डी.एम. जैसे इलीट क्लास केरेक्टर हिन्दी मिश्रित अंग्रेजी में बोलते नजर आते हैं। 'अकाल में उत्सव' में भाषा के इस बेहतरीन प्रयोग के साथ-साथ पंकज सुबीर ने किसानों और शहरी पात्रों की मानसिक दशा और उनके मन में चल रहे द्वंद-भावों को अभिव्यक्ति देने में जो चमत्कार उत्पन्न किया है वह सराहनीय है। 
 
उपन्यास ग्रामीण परिवेश और शहरी जीवन की झांकी को एक साथ पेश करते हुए आगे बढ़ता है। अर्थात एक ही समय में दो कहानियों का मंचन एक साथ इस उपन्यास में होता दिखता है। बजट लेप्स न हो जाए इसलिए सरकारी व्यय पर 'नगर उत्सव' का मनाया जाना और इसी दौरान ओलावृष्टि से किसान रामप्रसाद की न केवल फसल बल्कि जीवन का करूणांत इस उपन्यास का सार है। यद्यपि पाठक को शुरूआती कुछ पृष्ठों को पढ़ने के बाद ही पूरी कथा और कमोबेश कथा के अंत का अनुमान लग जाता है किंतु पात्रों की भाषा-संवाद और उनकी मनोदशा पाठकों को इस उपन्यास से अंत तक बांधे रखती है। दिलचस्प बात यह है, कि नितांत अलग-सी लगने वाली इन दोनों दुनिया का एक सम्मिलन स्थल भी है, जहां दोनों मुख्य पात्र अनायास रूप से मिलते हैं। 
 
उपन्यास में ग्रामीण जीवन और विशेषत: किसानों की जिंदगी पर बहुत करीने से रोशनी डाली गई है। किसान की सारी आर्थिक गतिविधियां कैसे उसकी छोटी जोत की फसल के चारों ओर केंद्र‍ित रहती हैं और किन उम्मीदों के सहारे वो अपने आपको जीवित रखता है, यह इस उपन्यास का कथानक है। 'रामप्रसाद' के माध्यम से पंकज सुबीर बताते हैं कि आम किसान आज भी मौसम की मेहरबानी पर किस हद तक निर्भर है। मौसम के उतार-चढ़ाव के साथ ही किसानों की उम्मीदों का ग्राफ भी ऊपर नीचे होता रहता है। मौसम का परिवर्तन इस तेजी के साथ होता है कि किसान को संभलने का मौका भी नहीं मिलता। सेंसेक्स एक बार डूबे तो संभलने की उम्मीदें लगाई जा सकती हैं, मगर किसान की फसल पर अगर पानी-पाला पड़ गया तो संभलने के सारे विकल्प समाप्त हो जाते हैं। मौसम की आंख मिचौलियों के बीच किसान न केवल तहसील-बिजली-बैंक-को'आपरेटिव जैसे विभागों के बकाये को चुकाता है बल्कि तमाम सामाजिक रस्मों को भी पूरा करता है। गांवों में आज भी विवाह और मृत्यु दोनों ही परिवार को समान रूप से कर्ज में डुबा कर चले जाते हैं। 
 
 
लेखक ने बड़ी कुशलता से बल्कि एक कृषि अर्थशास्त्री और सांख्यिकी विशेषज्ञ की हैसियत से किसान की उपज के मूल्य को आज के उपभोक्ता सूचकांको के सापेक्ष विश्लेषण की कसौटी पर जांचा है। लेखक बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पादों को कच्चे उत्पादों के बीच का गणित बहुत ही सरल अंदाज से समझाता है '' 1500 रूपए क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बिकने वाली मक्का का मुर्गी छाप कॉर्न फ्लैक्स 150 रूपये में 500 ग्राम की दर से बिकता है। मतलब 300 रूपए किलो या तीस हजार रूपए क्विंटल की दर से। 
 
किसान की दुर्दशा पर तब्सिरा करते वक्त लेखक ने 'रामप्रसाद' के उन निजी लम्हों पर भी रोशनी डालने का प्रयास किया है, जो प्रायः अंधेरे का शिकार होकर रह जाते हैं। इन्हीं कुछ निजी लम्हों में किसान रामप्रसाद अपनी पत्नी कमला के बारे में सोचता है। लेखक के शब्दों में ''शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल, जैसे नामों के साथ आपको कमला-रामप्रसाद की ध्वनि बिल्कुल अच्छी नहीं लगेगी। लेकिन यह दृश्य उन नामों के प्रणय दृश्यों से किसी भी तरह फीका नहीं है। इसमें भले ही चटख रंग नहीं है लेकिन, धूसर रंग तथा उन रंगों के बीच से अंखुआता प्रेम का उदास-सा मटमैले रंग का अंकुर, उन चटख रंगों पर कई गुना भारी है। 
 
लेखक ने लोक जीवन की झांकी को बिल्कुल जीवंत अंदाज में प्रस्तुत किया है। जब रामप्रकाश के बहनोई की मां की मृत्यु हो जाती है तो मातम का दृश्य लेखक ने बड़ी ही कुशलता के साथ जिया है। सूखा पानी और आस-पास के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं द्वारा मातम के अवसर पर रोने का अभी भी एक दिलचस्प तरीका है। यहां पर महिलाएं रोती कम हैं, गाती ज्यादा हैं। पारंपरिक रूप से उनको अपना दुख गा-गाकर ही व्यक्त करना होता है कुछ इस प्रकार -
 
'अरी तुम तो भोत अच्छी थी, कां चली गी रे ऽऽऽऽ'
'अरे अभी तो मिली थी मोय बड़नगर वाली बइ की शादी में रे ऽऽऽऽ'
'अच्छी खासी तो ले के गया था, डाग्दर होन ने मार डाली रे ऽऽऽऽ'
'सुबह-सुबह रोज दिख जाती थी रे ऽऽऽऽ' 
'अरे म्हारा राम जी यो तमने कंइ कर दियो रे ऽऽऽऽ'
'म्हारे से कहती थी कि सुमन तू म्हारे सबसे अच्छी लगे है रेऽऽऽऽ'
 
कर्जे और आर.आर.सी. की धनराशि चुकाने के समय किसान की मनोदशा का एक और उदाहरण मन में कहीं संताप, गहरी सी कुंठा छोड़ जाता है। ''कमला की तोड़ी बिक गई। बिकनी ही थी। छोटी जोत के किसान की पत्नी के शरीर पर के जेवर क्रमशः घटने के लिए होते हैं। और हर घटाव का एक भौतिक अंत शून्य होता है, घटाव की प्रक्रिया शून्य होने तक जारी रहती है। जब परिवार की महिला के पास इन धातुओं का अंत हो जाता है, तब तय हो जाता है कि किसानी करने वाली बस यह अंतिम पीढ़ी है, इसके बाद अब जो होंगे, वह मजदूर होंगे। यह धातुएं बिक-बिक कर किसान को मजदूर बनने से रोकती हैं।''' 
 
उपन्यास का यू.एस.पी. इसकी भाषा है, और भाषा में भी मुहावरों और लोक कहावतों का प्रयोग है। सच तो यह है कि कहावतें और मुहावरे तो भाषा का असली रस हैं। यदि उनको निकाल दिया जाए, तो भाषा नीरस हो जाएगी, उसमें कुछ भी आनंद नहीं बचेगा। लेखक ने मोहन राठी के पात्र के जरिए तमाम मुहावरों को उदृत किया है। उदाहरण के तौर पर - 
 
'कोरी का जमाई बड़ा जानपाड़ा, चाहे जो करवा लो.......!'
'रांडया रोती रेवेगी और पावणा जीमता रेवेगा।'
'बड़े-बड़े सांप-संपोले आए, हम कहां आईं बिच्छन देह .......?'
'उठ रांड, घर मांड, फिर रांड की रांड.......!'
 
लेखक इस पात्र के माध्यम से कहता है कि ''प्रशंसा, या विरोधी की निंदा सुनना है तो शारीरिक सुख जैसा ही आनंद लेकिन, उसमें और इसमें एक बड़ा अंतर यह होता है कि यहां पर कोई चरम संतुष्टि का बिंदु नहीं आता, यहां पर कोई स्खलन जैसा नहीं होता है। हर आनंद किसी बिंदु पर जाकर समाप्त होता है लेकिन, यह किसी भी बिंदु पर समाप्त नहीं हो सकता। यह तो एक सतत् प्रक्रिया है। यह त्वचा राग को नाखून से खुजाने जैसा आनंद है, आप जब तक खुजाते रहेंगे, तक तक आपको आनंद आता रहेगा, बल्कि बढ़ता रहेगा आनंद। आप खुजाना बंद करेंगे, तो आनंद आना बंद हो जाएगा, उसके स्थान पर फिर से खुजालने की उत्कंठा बढ़ जाएगी।'' इस तरह के मनोवैज्ञानिक कथन उपन्यास की गति को तो आगे बढ़ाते ही हैं प्रस्तुति में गजब का आकर्षण पैदा करते हैं। लेखक ने इस मर्म को पूरे उपन्यास में पकड़े रखा है।
 
बहरहाल 'अकाल में उत्सव' हमारे समय का वह महत्वपूर्ण उपन्यास है जो यह दिखाता है कि हम समानांतर रूप से एक ही देशकाल परिस्थिति में दो अलग-अलग जिंदगियां जी रहे हैं। एक ओर दबा कुचला हिंदुस्तान और उसका किसान है जिसकी दुनिया अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही टिकी हुई है और दूसरी तरफ चमकता दमकता इंडिया है, जहां तकनीकी प्रगति है, धन है, अवसर है।
 
लेखक पंकज सुबीर ने 'अकाल में उत्सव' के माध्यम से एक ऐसी कृति दी है जो हमारे देश को समझने के लिए महत्वपूर्ण औजार साबित हो सकती है। उन्होंने अपनी कृति के माध्यम से ऐसी चीखों को हम तक पहुंचाने का काम किया है जो कमोबेश अनसुनी और दबी रह जाती हैं। प्रमुख पात्र रामप्रसाद के करूणांत पर यही आह निकलकर रह जाती है कि 'आखि‍री शब दीद के काबिल थी बिस्मिल की तड़प, सुब्ह दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या.........।' 
 
 
उपन्यास :  अकाल में उत्‍सव 
लेखक :  पंकज सुबीर
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन
पृष्ठ संख्या : 224
मूल्य  : 150 रुपए
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