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पुस्तक समीक्षा : सन्नाटा बुनता है कौन

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समीक्षक : एम.एम.चन्द्रा
चंद्रलेखा का प्रथम काव्य संग्रह “सन्नाटा बुनता है कौन” स्त्री विमर्श के उन पहलुओं को उजागर करता है, जो आधुनिक चकाचौंध में धुंधला गए हैं। आधी आबादी ने मानव विकास की मंजिलों में अनेकों कठिनाइयों का सामना करते हुए बहुत-सी महिलाओं ने ऊंचाईयों को छुआ जरूर है, लेकिन आधी आबादी की कुछ समस्याएं आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।


आज आधुनिक महिलाएं अध्यापक, पुलिस, जज, लेखक आदि बन रहीं हैं। वे किसी भी ऊंचे स्थान पर पहुंच जाए या कोई भी सम्मान प्राप्त कर लें, लेकिन ये सब आधी आबादी का अंतिम सच नहीं है। लेखिका ने उन्हीं छुपी हुई सच्चाई, बेबसी, लाचारी, व्याकुलता, निराशा और छटपटाहट को पाठक के सामने लाने का साहस किया है, जो किसी एक स्त्री का दर्द नहीं, आधी आबादी का भी सच है -

कब तक चलना है ?
कहां तक चलना है ?
कब खत्म होगी मेरी तलाश ?
परिवार संस्था के बारे में विभिन्न लोगों के भिन्न विचार हैं। कोई उसे प्रगतिशील कहता है, तो कोई परंपरावादी। ऐसा माना जाता कि महिला के आगे बढ़ने के लिए परिवार संस्था मुख्य भूमिका निभाती है। लेकिन लेखिका का मानना है कि सामंती मूल्य कदम-कदम पर उसके रास्ते की बेड़ियां बनते हैं। सामंती मूल्यों से आधी आबादी अभी भी मुक्त नहीं है। 
घर आंगन में ही दफन है 
आधी दुनिया का व्यापार ..
क्योंकि-
एक्वेरियम को ही अपना 
वे सागर समझती हैं 
क्योंकि-
चुपचाप और 
बिस्तर पर बिछ जाती है 
पहचान मेरी 
क्योंकि –
लोहे की सलाखों  में 
मिलती है रौशनी उतनी ही  
लेना चाहते हम जितनी ही 
अलग-अलग खांचे सबके 
और अलग-अलग आकार 
क्योंकि -
इंसान से पशु बनते, देर नहीं लगती 
औरत का मूरत ही बने रहना 
अच्छा है, बहुत अच्छा है 
क्योंकि 
लगा दाव द्रुपदसुता को फिर भी धर्म राज कहलाए 
बने रहे पुरुषोत्तम तुम 
और सिया ने कष्ट उठाए
लेखिका ने अपनी कविताओं में सिर्फ स्त्री पक्ष के दर्द, घुटन एवं ऊब को ही नहीं दिखाया बल्कि जीवन के उस पहलू को भी दिखाया है, जो मनुष्य को हर पल जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। वह दूसरा पक्ष है उजाले का, क्योंकि हर रात के बाद दिन आता है –
इतना भी उदास न हो मेरे दिल 
रात कितनी ही काली और गहरी ही सही 
प्राची में स्वर्ण किरण का आना 
ऐ दोस्त 
अभी बाकी है, अभी बाकी है ...
लेखिका की कविताएं एक नई दुनिया को पाने का सपना बुनती हैं लेकिन वह सपना अपने लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए भी है, जिनके सामने घनघोर अंधेरा है। जब कविता व्यक्ति से आगे बढ़ जाती है और उसका दायरा व्यापक बन जाता है तो समझो कविता अपने आप में सार्थक सिद्ध होती है -
 
है उड़ता आज अकेला तो क्या? 
पंछी उड़ते पीछे जो तेरे, 
उनको राह दिखाता जा... 
अपना उन्हें बनाता जा ....
पंख फैला तू उड़ता जा, बस उड़ता जा.... 
 
चंद्रलेखा की कविताओं में जो संघर्ष जुझारूपन, आकांक्षा दिखाई देती है, वह सिर्फ आधी आबादी को ही प्रेरित नहीं करती बल्कि संपूर्ण मानव समाज को उर्जा प्रदान करती है।  यही कारण है कि उनकी कविताएं एक पाठक के दिल में अपनी जगह बनाती है। एक तरफ उन्होंने मानव समाज की दशा का चित्रण, सहज-सरल शब्दों में किया है, वहीं दूसरी तरफ समाज को दिशा देने का काम भी बखूबी किया है -
फूट पड़ने को है 
सोने चांदी के महल 
अब ढहने को हैं 
इंकलाब कोई होने को है 
 
पुस्तक - सन्नाटा बुनता है कौन 
लेखि‍का - चंद्रलेखा 
प्रकाशक - हिन्द युग्म 
कीमत - 140
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