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हिन्दी निबंध : होली (रंगों का त्योहार)

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होली यानी होलिकोत्सव के लिए कई दिन पहले से बच्चे लकड़ी, कंडे एकत्रित करते हैं। एक माह पूर्व होली का डांडा गाड़ा जाता है। इस त्योहार का संबंध खेती से भी है। इस समय तक गेहूं व चने की फसल अधपकी तैयार रहती है।


 
किसान इसे पहले अग्नि देवता को समर्पित कर फिर प्रसादस्वरूप स्वयं ग्रहण करता है। नई फसल आने की खुशी में किसान ढोलक, डफ और छैने बजाकर, नाच-गाकर समां बांध देते हैं।


 




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फाल्गुनी पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन होता है। बच्चे-बूढ़े सभी प्रसन्न हो अगले दिन सुबह से ही रंग-गुलाल आपस में लगाने जाते हैं एवं मिठाइयां खाई-खिलाई जाती हैं। दोपहर पश्चात खुलकर रंग खेला जाता है। बाद में स्नान कर नए वस्त्र पहने जाते हैं।

यह मस्ती और उमंग का त्योहार है। आपस में मिल-जुलकर गले मिलकर बिना किसी भेदभाव के यह त्योहार मनाया जाता है।
 
इन दिनों इस त्योहार का महत्व कम होता जा रहा है। सभ्य लोग इस दिन अपने घरों में बैठे रहते हैं, क्योंकि कुछ लोग शराब पीते हैं, गालियां देते हैं और फूहड़ हरकतें करते हैं।
 
रंग-गुलाल की जगह गंदगी, कीचड़ फेंकते हैं। अत: आवश्यक है कि हम इस त्योहार की गरिमा को बनाए रखें। यह त्योहार आनंदवर्धक है इसलिए इसे बड़ी सादगी से मनाना चाहिए।
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