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धूप को भूख नहीं लगती, प्‍यास नहीं लगती, धूप भी नहीं लगती...

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नवीन रांगियाल

धूप निकल आई है। उतनी ही जितनी कि कोई स्त्री बाहर देखने के लिए अपने कमरे की खिड़की खोलती है, हल्की-सी। एक महीन-सी लकीर की तरह खिंच आई है फर्श पर। धुएं में गुंथी हुई। जैसे कोई रॉकेट आसमान में लकीर खींचकर गुजर जाता है, ठीक वैसे ही। प्रकृति क्रूर है और बेहद उदार भी। वो सब बांटती है अपने अनुपात में। थोड़ा-थोड़ा, ज्यादा-ज्यादा। उपकार भी और विनाश भी।


मुझे धूप पसंद है, बारिश और ठंड नहीं। मुझे धूप हर अनुपात में चाहिए। बहुत ज्यादा हो तब भी और बहुत कम हो तब भी। इसी वजह से दोपहरें भी अच्छी लगती हैं। गर्मी की दोपहरें। उंघती हुई उदास। और उबासियों से भरी हुई। वो एक इत्मीनानभरा आलस्य दे जाती है। धूप से भरी गर्म दोपहरों में रेंगते रहो अजगर की तरह। बगैर किसी इच्छा और खौफ के। विदाउट फूड एंड डेस्टिट्यूट।

जो लोग कहते हैं कि उन्हें बारिशें अच्छी लगती हैं, वे सिर्फ आसमान की बारिशों की बात करते हैं। उसमें जमीन का कीचड़ शामिल नहीं है। वे घर की सीलन और दीवारों की नमी को नजरअंदाज करते हैं।

हवा में झूलती हुई बूंदें ही अच्छी नजर आती हैं, जमीन पर वो कीचड़ है। अपने नहीं होने में सबकुछ सुंदर है, बिना किसी गहराई के। होने में एक कातर गहराई है। भयावह अपनापन। शायद इसलिए ही कृष्ण बलदेव वैद्य ने कहा था कि 'एक हद के बाद हर गहराई में एक-सा कीचड़ है'।

बारिश की बूंदें भी गिरने से पहले का सौंदर्य हैं। गिरने के बाद गिरने की गहराई। जहां गहराई है वहां कीचड़ है, अंधेरा भी है। इसलिए मैं उजली धूप में रहता हूं। तपती हुई। सबकुछ साफ। सफेद लिबास की तरह। धूप में कोई गहराई नहीं। वो थोड़ी भी धूप है, ज्यादा भी धूप है। पानी कम भी कीचड़ है और ज्यादा भी कीचड़।

अल्बेयर कामू के नॉवेल 'ले एत्रेंजर' का प्रोटॉगनिस्ट म्योरसाल मेरा प्रिय किरदार है। उसे धूप बहुत पसंद है। वो धूप में घूमता रहता है, बार-बार धूप का जिक्र करता है, उसे भीतर बीयर की नर्म ठंडाई चाहिए और बाहर तपती हुई धूप का आलोक। इसलिए वो अल्जीरिया के समुद्री तटों पर घूमता रहता है बीयर गटकते हुए।

इस नॉवेल को पढ़ते हुए गहरी अंधेरी और ठंडी रात में भी सिर के ऊपर गर्म धूप से भरा और तपता हुआ दिन महसूस होता है। धूप में रहकर म्योरसाल धूप की तरह हो जाता है। सब मौसम में धूप। उसकी जिंदगी के दाग उसके चेहरे पर धूप के चकतों के रूप में साफ नजर आते हैं। धूप भी अपने दाग नहीं छुपाती। उसमें सबकुछ साफ- साफ दिखता है।

जब म्योरसाल को तार मिलता है कि उसकी मां की मृत्यु हो गई है तो वह दफ्तर से अवकाश लेकर मां के अंतिम संस्कार में पहुंचता है। रातभर मां के कॉफीन के सामने धूप की तरह सख्त होकर बैठा रहता है। मां के 'लास्‍ट रिच्युअल्स' के बाद वो जब वापस लौटता है तो बीयर पीता है, अपनी गर्लफ्रेंड के साथ सेक्स करता है और धूप के नीचे बहते स्वीमिंग पुल में नहाता है। म्योरसाल हर जगह धूप की तरह है, सुख में और दु:ख में भी। वो सब जगह और सारी अवस्थाओं में धूप की तरह एक जैसा ही खिलता है और पसरता है।

धूप का मनोविज्ञान नहीं है, मनुष्य का मनोविज्ञान है। उसे अपनी जरूरत के मुताबिक धूप चाहिए और छांव भी। उसे अनुपात में प्रकृति चाहिए। उसे बारिश भी चाहिए और धूप भी। जब बारिश होती है तो उसे धूप नहीं चाहिए, धूप आती है तो उसे छांव चाहिए। उसे कोहरा भी उतना चाहिए जितना उसे उसकी प्रेमिका का हाथ थामने के दौरान चाहिए। कोहरा तो कोहरा ही होता है, वो अनुपात में क्यों आए? क्यों कम, क्यों ज्यादा। धूप को भूख भी नहीं लगती, प्यास भी नहीं लगती और धूप को धूप भी नहीं लगती। बारिश को भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती और वो भीगती भी नहीं।

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