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हिंदी पत्रकारिता दिवस: कोरोना काल में हिंदी के पत्रकारों की स्थिति पर चिंतन

Webdunia
सुरभि भटेवरा

राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता दिवस हर साल 30 मई को मनाया जाता है। इस दिन को हर साल इसलिए मनाया जाता है क्योंकि आज के दिन हिंदी भाषा में ‘‘उदंत मार्तण्ड’’ के नाम से पहला समाचार पत्र 1826 में निकाला गया था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इस अखबार की शुरुआत की थी। यह एक साप्ताहिक अखबार था। इसका प्रकाशन और संपादन जुगल किशोर ने ही किया था। पंडित जुगल किशोर का पत्रकारिता के जगत में विशेष सम्मान और अदब से नाम से लिया जाता हैं।

हालांकि उदंत मार्तण्ड एक साप्ताहिक अखबार था। यह हर मंगलवार को प्रकाशित किया जाता था। इस अखबार को शुरू करने का मकसद था हिंदुस्तानियों के हक की बात करना। यह एक साहसिक प्रयास था लेकिन पैसों की तंगी के चलते यह अखबार लंबे वक्त तक नहीं चल सका और 4 दिसंबर 1826 को इसका प्रकाशन बंद हो गया। करीब 500 काॅपी हर सप्ताह छपी थी। हालांकि डाक की कीमत बहुत अधिक होने से यह साप्ताहिक हिंदी अखबार हर जन - जन तक नहीं पहुंच सका।

धीरे - धीरे वक्त बदलता गया। कई सारे हिंदी समाचार पत्रों को उदयमान हुआ। आबोहवा बदली, इतिहास रचे गए, हिंदी पत्रकारिता मिसाल बनकर उभरा, जनता की आवाज बना, जनता और सरकार के बीच का सबसे बड़ा माध्यम बना लेकिन कोई नहीं जानता था कि आने वाले समय में जनता और सरकार के बीच का मीडियेटर गहरे संकट में पड़ जाएगा। जी हां... आज के वक्त में कई सारे ऐसे पत्रकार है जिन्हें मीडिया हाउस से पैसों की तंगी नहीं बल्कि मुनाफा कम होने पर निकाल दिया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में खासा निवेश हुआ और आज यह एक उद्योग के तौर पर पहचाना जाता है। लेकिन कई सारे मीडिया हाउस कंपनियों पर जरा भी आर्थिक भार आने पर पत्रकारों को टर्मिनेशन लेटर थमा दिया जाता है या खुद से ही इस्तीफा देने के लिए कह दिया जाता है।

बदलते वक्त में कोरोना काल के दौर में पत्रकारों पर डबल संकट का साया मंडराया। जी हां, एक तरफ कोरोना के खिलाफ जंग तो दूसरी नौकरी जाने का डर बना रहना।

कोविड-19 के दौर में एक ओर जहां सरकार के लिए इस महामारी से लड़ना चुनौती  है वहीं प्रेस के द्वारा सच्चाई उजागर करना, जनता तक सही आंकड़ों को पहुंचाना, वर्तमान परिस्थितियों से आगह कराना बड़ा विषय है। मीडिया समूह द्वारा जब कोरोना से जुड़े आंकड़ों को जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया तब कानून की मदद से प्रेस की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। नियमों में बदलाव किया, पत्रकारों पर कार्रवाई की गई, जेल में बंद किया गया और प्रवेश पर बैन लगाया गया।

आंकाड़ों पर नजर डाली जाएं तो यह पत्रकारों के लिए डर का भाव ही पैदा करेगी। जी हां...जानकारी के मुताबिक एशिया-प्रशांत में भारत देश में कई पत्रकारों पर हमले हुए, पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। तो कई पत्रकारों को हमलों का शिकार भी होना पड़ा।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के मुताबिक 2021 में करीब 10-15 पत्रकारों पर उस वक्त हमले हुए जब वह कोरोना काल में किसान आंदोलन में रिपोर्टिंग करने गए थे।

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