Dharma Sangrah

नए वर्ष की कविता : ऋतु वार्षिकी

Webdunia
- शंकरदयाल भारद्वाज
 

 
नए वर्ष की शुभ पाती है,
राम जन्म कविता गाती है।
गेहूं की बाली में दाने,
आया चैत्र पुन: मुस्काने।।
 
मिट्टी का घट खस का पानी,
वट की छाया राम कहानी।
तपता सूरज यह वैशाख।
अपने मन को शीतल रख।।
 
ज्येष्ठ मास की तपती भू,
उठे बवंडर चलती लू।
दिन है भारी रातें छोटी,
खाते जाओ रस औ'रोटी।।
 
कजरारे-कजरारे बादल,
उमड़-घुमड़ में बरसे जल।
प्रिय आषाढ़ की सौंधी गंध,
पाट दिए धरती के रंग।।
 
कजरी झूला टिप्पा गाए,
सुन-सुन करके रहा न जाए।
नदियां श्रावण-श्रावण गाए,
रक्षाबंधन के दिन आए।।
 
भादो मास निराली रातें,
रिमझिम-रिमझिम बादल गाते।
इसी रात में कृष्ण-कन्हैया,
जन्मे थे कहती है मैया।।
 
देखो शरद पूर्णिमा आई,
आश्विन है सबको सुखदायी।
धुला-धुला अम्बर-धरती हैं,
सुधाबिंदु कण-कण भरती हैं।।
 
लजा-लजा के लटकी बाली,
शस्य-श्यामला भू-मतवाली।
कार्तिक कण-कण मोती जड़ती,
आभूषण पहने है धरती।।
 
छोटे-छोटे प्यारे दिन हैं प्यारे,
मार्गशीर्ष आया है द्वारे।
गीता कहती सुन्दर मास,
अर्चन पूजन व्रत उपवास।।
 
कंपता जाड़ा पड़े तुषार,
पौष मास का यह अवतार।
चौबारे में जले अलाव,
टीवी कहती बढ़ा गलाव।।
 
आया पावन माघ नहाने,
गंगा यात्रा इसी बहाने।
दोनों बंधु हेमंत-बसंत,
नहा-नहा के हो गए संत।।
 
न ठंडी धूप लगी,
धरती रानी बहुत सजी।
प्रिय रसाल फिर से बौराए,
फागुन के मीठ दिन आए।।
 
साभार - देवपुत्र 
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