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हिन्दी कविता : आजकल

तरसेम कौर
आजकल बचाने वाले कम हैं
मारने वाले ज्यादा हो गए हैं
हर कोई नजर गड़ाए बैठा है
 
कोई किसी के शरीर पर
कोई किसी के पैसे पर
किसी को है किसी की कुर्सी की चाह
तो किसी को है किसी की जिंदगी की चाह
घर की दीवारें 
और धरती की सीमाएं
बढ़ रही हैं दिन ब दिन
पत्थर मार के की जाती हैं बातें
 
प्यार मोहब्बत और ईमान को
बंद करके रख दिया है एक तिजोरी में
जिसकी चाबी फेंक दी गई है
हंसी और कहकहे भाप बनकर खो गए हैं
 
बन गए हैं बादल न बरसने वाले
ले रही तोहफा हमसे अगली पीढ़ी 
खोखली इंसानियत का 
पैबंद लगे फटे पुराने रीति रिवाजों का..!!
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