ममता भारद्वाज मनवा संभालू कैसे डोर हमसफर की थक गई चलते-चलते राह जिंदगी की जहां तलाश थी ताउम्र मुस्कुराने की वहीं भूल गई मुस्कुराना जिंदगी में किससे करूं गिला किससे करूं शिकायत जो खो गई आवारगी में था सर पर ताज जीवन तलाश ना सकी आज जमाने से लाचार...