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हिन्दी कविता : जागती आंखों के सपने...

सुशील कुमार शर्मा
जागती आंखों के सपने,
कभी हसीन नहीं होते हैं।


 
गरीबी में जन्मते हैं, 
संघर्ष में पलते हैं।
 
खुली आंखों के सपनों में,
बेचारी है, व्यथा है।
 
दर्द है, दवा है,
टूटी खाट है, बीमार मां है।
 
खेतों में जुता बाप है,
हाड़-तोड़ मेहनत है।
 
फटी कमीज है,
सरकारी स्कूल है।
 
फटी सरकारी किताबें हैं, 
फटी टाट-पट्टी है।
 
इल्ली वाला मध्यान्ह भोजन है,
ऊंघते गुरुजी हैं।
 
गांव से शहर की आसमानी दूरी है,
आरक्षण का सांप है।
 
नीलाम होती सीटें हैं,
गुलाबी नोटों वाले इंटरव्यू हैं।
 
चमचमाती कारें हैं,
गगनचुंबी इमारतों के बीच।
 
फुटपाथ पर भूख से लबालब,
जागती आंखों का सपना है।
 
संघर्ष हैं, शूल हैं,
गर्द है, धूल है।
 
अपनी-अपनी अभिव्यक्तियां हैं। 
 
भागता विकास है,
सुनहरे भविष्य की आस है।
 
लेकिन खुली आंखों के सपने,
किसी को पुकारते नहीं हैं।
 
एक बार ठान लिया,
तो कभी हारते नहीं हैं।
 
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