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हि‍न्दी कविता : ‘वो’

मधु शर्मा कटिहा
मधु शर्मा कटिहा 
 
सुनहरे रंग तुझ जैसे, बिखरे फिर आफताब के,
अंगूठी के तेरी नगीने से, चमके रंग महताब के।
 
ओस की बूंदें लुढ़ककर, बिखरी फिर मोतियों सी,
बस गए आंखों में वो इक हसीन ख्वाब से। 

याद आ गईं बातें, जो असर करती हैं मंतर-सी,
किया करते हैं जो टोना, किस्से जादुई किताब से।  
 
सुर्ख-सी इक सादगी, वफाओं में महक इत्र की,  
खिल रहे हों मिट्टी में सौंधी, जैसे गुल गुलाब के। 
 
संवरता है सुहाना समां, देख तुझ को सामने, 
फूल तुझ पर हों निसार, कि तुम कोई नवाब से।
 
परिंदों से उड़ें बादल, करने को छाया तेरे सर पे, 
घूमते हैं आसमां में, कब से यूं बेताब से।
 
हवा है या दरख्त भी, झुकते करने को सलाम,
सब तरफ चर्चे तेरे इस मासूम से रुआब के।  
 
देखा ये मंजर हाथ माथे से लगा, पलकें झुकी,
चुप-सी मैं और कह दिया सब, बस इसी आदाब से।  
 
फख्र क्यों होगा नहीं, जुनून-ए-मोहब्बत पर मुझे,
नायाब वो, लाजवाब है लगे ‘पर’ उसमें ‘सुर्खाब’ के।  
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