Dharma Sangrah

कोरोना पर कविता : घबराना न इस दौर से दोस्तों...

डॉ. अंजना चक्रपाणि मिश्र
दहशत भरी है दिलों में,मोहल्लों में मातमी साये हैं
 
 लोग हैं हारे टूटे ,कोविड सितम, कमर तोड़ गया है,
ढा रहा है कहर औ ज़िन्दगियों को झिंझोड़ गया है!
हैरां है हर आदमी,ग़मगीन चेहरे पे मुर्दनी पसरी हुई,
जाने कौन ये ठीकरा,सबके सर पर फोड़ गया है!
बिछड़े जो इंसान अपनों से,मिल न पाएंगे वे कभी,
मजबूरियां इतनी, इंसान ही इंसान से मुँह मोड़ गया है!
दहशत भरी है दिलों में,मोहल्लों में मातमी साये हैं
वबा की बेबसी ऐसी आयी, मानुष हाथ जोड़ गया है!
घबराना न इस दौर से दोस्तों ये अंजन कहती है
अंधेरी शब बिता आफ़ताब हर रोज़ शुआ'-ए-उम्मीद छोड़ गया है!
स्वयं मैं ही-
डॉ.अंजना चक्रपाणि मिश्र 
इंदौर,मध्यप्रदेश

आफ़ताब-सूरज 
शुआ-ए-उम्मीद - उम्मीद की किरण

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

अंधेरे में जलती एक अटूट लौ: माता गांधारी देवी का जीवन दर्शन

सुर्ख़ फूल पलाश के...

गांधी महज सिद्धांत नहीं, सरल व्यवहार है

Vastu Remedies: वास्तु दोष निवारण के सबसे असरदार 5 उपाय

क्या डायबिटीज रोगी कीवी खा सकते हैं?, जानें 4 फायदे

सभी देखें

नवीनतम

लाला लाजपत राय जयंती 2026: ‘पंजाब केसरी’ का इतिहास, संघर्ष और प्रेरणादायक संदेश

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को सकारात्मक दृष्टि से देखें

देशप्रेम का बीज

ट्रंप के घुड़की-धमकी वाले स्वर दावोस में अचानक बदले

नर्मदा की अनंत धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान

अगला लेख