सपना मांगलिक कहते विकलांग उसे, जिनका अंग भंग हो जाता मिलता यह दर्जा मुझको तो, क्यों मैं स्वांग रचाता झूठा वेश खोखली ताली, दो कोठी बस खाली जीता आया नितदिन जो मैं, जीवन हैं वो गाली। घिन करता इस तन से हरपल, मन से भी लड़ता हूं...