suvichar

प्रेम कविता : एक दोपहर झिलमिलाती हुई...

स्मृति आदित्य
तमाम उदास और थकी हुई
व्यस्त दोपहरियों के बीच भी 
अक्सर टंकी रहती है 
स्मृतियों की चुनर में 
कोई एक दोपहर 
झिलमिलाती हुई...  
और उसी के बीच 
कोई एक चंचल शाम भी मुस्कुराती हुई.... 
 
गुलाबी, हल्की नीली या सुनहरी केसरिया 
ताजा‍तरीन और सौंधी सी महक वाली 
 
ना जाने कितने रंग बोलते हुए 
शब्द गाते हुए, 
आंखें भीगा सा मन समझाती हुई 
और मन आंखों को सहलाता हुआ... 

कोई हाथ बस चेहरे तक आकर रूका हुआ 
कोई नजर अनदेखा करते हुए भी देखती हुई... 

थरथराते होंठों पर कांपती हुई 
कोई एक अधूरी सी कविता 
उसी एक दोपहरी के नाम 
जो टंकी है स्मृतियों की चुनर पर
बरसों से .. . 
 
और बरस हैं कि 
चुनरी से झरते ही नहीं 
मोह धागे में बंधे 
इन बरसों के लिए भी बहुत कुछ लिखना है... 
लेकिन फिर कभी...  
Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

गर्मियों में आइस एप्पल खाने के फायदे, जानें क्यों कहलाता है सुपरफ्रूट

आम का रस और कैरी पना, दोनों साथ में पीने से क्या होता है?

गर्मी के दिनों में फैशन में हैं यह कपड़े, आप भी ट्राय करना ना भूलें

क्या गर्मियों में आइसक्रीम खाना बढ़ा सकता है अस्थमा का खतरा?

कैंसर शरीर में कैसे फैलता है? जर्मन रिसर्च टीम ने किया नया खुलासा

सभी देखें

नवीनतम

सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि!

23 मार्च शहीदी दिवस: इंकलाब के तीन सूरज: जब फांसी के फंदे भी चूम लिए गए

भारतीय न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. वरुण जर्मन पुरस्कार से सम्मानित

चहक रहा है चूल्हा

परिंदे नहीं जानते कि उनकी मौत किसी सरकारी फाइल में दर्ज नहीं होगी

अगला लेख