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कविता : तुम्हारे तट पर.…

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अविनाश बागडे
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितने नगर बसे होंगे, 
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितने नगर नए होंगे 
साथ समय के नदी तुम्हारी धारा कितनी बार मुड़ी
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितने नगर बहे होंगे 
 
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितनों ने जीवन पाया 
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितनों को ही भरमाया 
लिए समय की रेत मुट्ठियां खाली-खाली दिखती हैं  
नदी तुम्हारे तट पर जाने कितनों ने रीता पाया 
 
नदी तुम्हारे तट ये जाने कितनी-कितनी बार कटे 
नदी तुम्हारे तट ये जाने कितनी-कितनी बार घटे
नदी तुम्हारी धाराएं भी साथ समय के लुप्त हुई 
नदी तुम्हारे तट ये जाने कितनी-कितनी बार पटे 
 
नदी तुम्हारे तट पर अब तो मेले नहीं नजारों के 
नदी तुम्हारे तट पर अब ना खिलते फूल बहारों के 
गगन चूमती इमारतों ने अब तो पैर पसारे हैं 
नदी तुम्हारे तट पर अब तो कौव्वे हैं बाजारों के  
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