वृक्ष धरा का भूषण है यह प्रतिपल नूतन आभूषण है जन-जन का यह जीवनदाता देश का है यह भाग्य-विधाता कबहुं वृक्ष नहि निज फल चखता परमारथ का संगीत सुनाता पानी को यह संचित कर सृष्टि को नवजीवन देता प्राणीमात्र का जीवनदाता पशु-पक्षी का शरणदाता यह...