कागा नित दरवाजे पर मेरे, कांव-कांव जब करता है। आते होंगे प्रीतम मेरे, मन उमंगें भरता है।। सज-धज मैं राह निहारूं, हो जाती है शाम। काम-काज में मन नहीं लगता, न झांव, न घाम।। बीते पल को सोच-सोचकर, सूरज यूं ढलता है। फोन की घंटी जब...