मैं धूल हूँ इस शहर की उड़ती हुई मुझसे बचने के लिए मुँह पर रूमाल बाँध लेते हैं लोग छींटते हैं पानी घर और दुकान के बाहर दरवाजों-खिड़कियों में लगाई जाने लगी हैं जालियाँ
मैं तो इसके बाद भी जहाँ जाना होता है चली जाती हूँ आने-जाने वालों को भला कोई रोक सका है
मुझे क्या रोक सकोगे तुम मैं तो धूल हूँ इस शहर की उड़ती हुई।