वो एक कच्ची मिट्टी-सा रिश्ता और मैं एक नौसिखिया कुम्हार, कई बार चढ़ाया उसे चक्र पर, कई बार बिगड़ा मेरे हाथों से, पर हिम्मत नहीं हार ी टेढ़ी-मेढ़ी शक्लें देता रहा इस उम्मीद में कि किसी दिन सीख जाऊँगा मैं भी रिश्तों को गढ़ना सुंदर आकार देन ा वो एक कच्ची मिट्टी-सा रिश्त ा अलगाव की तपिश में पकाया कभी कभी रंगा जीवन के नए रंगों स े सपनों की चित्रकारी की उस पर तो कभी भरा नई उमंगों स े कि जब भी कोई जीवन की कड़ी धूप में चलत े बैठ जाए थकक र तो दे सकूँ कुछ मीठी-सी ठंडक लेकिन वो एक कच्ची मिट्टी-सा रिश्त ा आखिर था तो कच्ची मिट्टी से बना और मैं एक नौसिखिया कुम्हार...