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बच्चे हिन्दू, मुस्लिम या सिख नहीं होते : कैलाश सत्यार्थी

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रूना आशीष

बचपन बचाओ आंदोलन के प्रणेता नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सत्यार्थी से 'वेबदुनिया' की खास बातचीत

'घरों 'घरों के अंदर जब छोटी-छोटी बच्चियों से उनके चाचा या ताऊ या पिता बलात्कार करते हैं तो बहुत दु:ख होता है या कभी स्कूलों में शिक्षक, बच्चियों के साथ मुंह काला करते हैं तो लगता है कि समाज में ये क्या हो रहा है? कई लोग इसके बारे में जानते और समझते हैं और वो चुप रह जाते हैं। उन लोगों की ये ही चुप्पी ही हिंसा को जन्म देती है। अगर समाज में कोई आम शख्स कुछ करना चाहता है तो बहुत जरूरी है कि वो बोले, आवाज उठाए। उस बच्ची से बात करें, उसे समझाएं।'
 
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने 'वेबदुनिया' से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए संवाददाता रूना आशीष को बताया कि हम हमारे देश को तो लक्ष्मी या दुर्गा का देश पुकारते हैं लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि जब इसी देश की किसी लड़की का बलात्कार हो जाता है तो उसी पर लांछन लगा दिया जाता है। मां-बाप डर जाते हैं कि इस मामले को छुपा दो, भूल जाओ या पुलिस को मत बताओ। वर्ना शादी कैसे होगी?
 
कभी-कभी लड़की इतनी डर जाती है कि वो अपनी मां तक को नहीं बता पाती कि क्या हुआ है उसके साथ? कहा जाता है कि 'लड़की की इज्जत लुट गई।' मुझे समझ नहीं आता कि लड़की की इज्जत कैसे लुट गई? इज्जत तो उस मर्द की गई जिसने ऐसा किया है।
 
ऐसे में पालक या माता-पिता क्या करें?
 
पहले तो दोस्ताना व्यवहार करें अपने बच्चों से। आप उनके लिए बढ़िया से बढ़िया चॉकलेट लेते हैं, अच्छी से अच्छी स्कूल में दाखिला कराते हैं ताकि वो अंग्रेजी में गिट-पिट कर सके या ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार गा सकें। लेकिन इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि वो बच्चा आपसे बातें बोल सके। उससे दोस्ताना रिश्ता कायम करें ताकि वो आपको बता सके कि देखो आज स्कूल में टीचर ने ऐसे देखा या घर में मामा या ताऊ ने ऐसे छुआ है। जो लोग बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो वो सबसे पहले शुरुआत करें बच्चों से दोस्ती रखने की, उन पर रहम करने की नहीं।
 
बाल श्रमिकों की बात करें तो उन्हें जहां से निकाला जाता है, वो भी कोई कंपनी ही होती है। ऐसे में किसी भी कंपनी में सीएसआर की भूमिका क्या होना चाहिए या उनका सामाजिक दायित्व क्या हो? 
 
देखिए, कोई बच्चा अफ्रीकी, अमेरिकी या पाकिस्तानी नहीं होता। वो तो एक बच्चा ही है। ये हम उसे बांट देते हैं और हमने ये काम किया है और इस काम को करने का इल्जाम मुझ पर है। बच्चे, हमारे बच्चे होते हैं। वो हिन्दू, मुस्लिम या सिख नहीं होते। पहले के जमाने की बात थी कि बदलाव या सामाजिक परिवर्तन का काम सरकार या धर्मगुरु का होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। कॉर्पोरेट की दुनिया अब बहुत फैल चुकी है और बढ़ चुकी है। ऐसे में उनकी सीएसआर एक्टिविटी भी होनी चाहिए।
 
उन लोगों को कुछ काम करने चाहिए मसलन वो अपनी कंपनी में बच्चों को काम पर न रखें। उनके यहां काम करने वालों के बच्चे हों तो ध्यान रखें कि वो स्कूल सही तरीके से जा रहे हैं। अगर लड़कियों का बात हो तो वो सुरक्षित हों। अपनी कंपनी में काम करने वालों को ट्रेनिंग कराएं कि बच्चों की कैसे परवरिश हो?
 
अपने लड़कों को समझाएं कि लड़की से पेश कैसे आना है? वो इस काम को संजीदगी से करे। ये नहीं कि पैसे खर्च कर दिए या सरकार की किसी स्कीम को अपनाकर बस मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवा लिया। एक दिन जब बूढ़े हो जाओगे तो क्या मुंह दिखाओगे भगवान को? उस दिन मत सोचते रहना कि मैंने तो कुछ नहीं किया। सीएसआर का पैसा बच्चों के लिए उपयोग करो। 
 
आप बच्चों के लिए इतना काम करते हैं, आपने निजी जिंदगी में अपने बच्चों को कितना डांटा है?
 
मैं नहीं डांटता अपने बच्चों को। मेरा बड़ा बेटा है। भुवन रीभु नाम है उसका। सुप्रीम कोर्ट में लॉयर है। सुप्रीम कोर्ट की चाइल्ड लेबर कोर्ट 10 में से 9 केस की जीत उसी के नाम पर है। इस विषय पर उसे एक्सपर्ट माना जाता है। बहुत पहले एक बार मैंने उससे गणित का सवाल पूछा था और उसे नहीं आया था तब मैंने उसे डांटा था। फिर उसमें बेटे को 100 में से 100 अंक मिले हैं। बेटी को कभी नहीं डांटा बल्कि वो मुझे डांटती है।
 
बच्चों के बारे में और भी कुछ बताएं। कभी डांटा उनको?
 
हमने कभी अपने बच्चों पर कोई बात की जबर्दस्ती नहीं की है। न ही मैंने और मेरी पत्नी ने उन्हें कभी डांटा। उन्होंने तो सरनेम भी अपना मर्जी से चुना। हम तो अपना सरनेम भी रखना छोड़ चुके। हमारे बेटे ने एक उड़िया लड़की से शादी की। हमें कोई परेशानी नहीं थी। हमें तो आज भी नहीं मालूम कि हमारी बहू किस जाति की है?
 
बेटी अस्मिता पर कई बार हमले हुए। जब हमारे आंदोलन जोरों पर थे तो माफिया वाले हमारी बेटी के साथ भी वो ही करना चाहते थे, जो वो नेपाल की लड़कियों के साथ करते थे यानी बलात्कार करते उन्हें बेचने के लिए। लेकिन उसने बहादुरी से सामना किया और आज वो मुंबई में सोशल बातों और विषयों पर ही काम करती है।

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