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कहानी : "अक्षरों की अक्षरा "

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कार्तिक सागर समाधिया
1.बात अगर मिलने की हो तो जाने कौन-सी तूफान की हलचल मन में आकर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेती है। वहीं दूसरी और अगर बात बिछड़ने की हो तो तब भी जाने कौन-सी हलचल दिल में आकर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेती है।
एक साल बीत चुका है। एक साल बचा है। जो बीत गया है, उस एक साल में एक रिश्ता बना है। रिश्ता जिसको मिलने में बीस साल लगे है। 20 साल तक हम अनजान थे। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जीवन में एक साथ ऐसा भी मिलेगा। जब तक वो बना है जीवन पूरा सा लगता है और जिस दिन साथ छूट जाएगा जिंदगी की आगे कल्पना करना मुश्किल हो जाएगा। वैसे कल्पना न ही की जाए तो अच्छा है, अगर कल्पना सच नहीं होती तो फिर जीवन और बोझिल हो जाता है। पर अगर कल्पना न की जाए तो जीवन में करना क्या है हम सोच नहीं पाते। हम अपने प्रति दार्शनिक नहीं बन पाते और खुशियों का आसमान नहीं देख पाते।
 
कुछ ऐसे ही सवालों का जाल बुनता सुलझाता सागर कॉलेज पहुंच जाता है। आज तीसरे सत्र का पहला दिन था। कॉलेज में ज्यादा हलचल नहीं थी। ऐसा अक्सर नहीं होता पर कई बच्चे अपने घरों से नहीं लौटे थे। खैर सवालों के जाल से निकलकर सागर बाहर आता है और एक सवाल अपने आप से करता है "3 किलोमीटर का यह पैदल रास्ता हमेशा की तरह अखरा नहीं ऐसा क्यों?
 
अंतरमन की गहराई में एक पल की कोशिश नाकाम होती है और बेरुखा सा जवाब आता है। जनाब विज्ञान पढ़ना पढ़ेगा आपको अगर उत्तर पता करना है तो ?
अल्बर्ट आइंस्टाइन का सापेक्ष्य सिद्धांत पढ़ो । 
 
2.
अभी कैंपस में प्रवेश ही हुआ था कि किसी का पीछे हाथ आकर उसकी पीठ को थपथपाता है।
वह पलटता है और मुड़ कर देखता है तो उस शख्स को खड़ा पाता है जिसके बारे में आधे घंटे से सोच रहा था।" प्रकृति का नियम है जिस चीज को आप पाना चाहते है उसके लिए एक बार आपको अपने दिल के अंदर प्रेम का दीप जलाना पड़ेगा। बस आप एक बार उसको पाने के लिए सकारात्मक हो गए तो कभी आपको उसके बिछड़ने का भी गम न होगा। आप उसको हमेशा अपने पास पाएंगे। विश्वास नहीं होता तो करके देखिएगा।"
 
हैलो, सागर ! (आवाज उसकी ही थी, चेहरे पर मुस्कराहट लिए, बालों को लटों से मछली-सी आंखों को ढांके हुए एक लड़की थी, नाम जिसका "अक्षरा" था)
 
हैलो, अक्षरा! कब आईं तुम ? बताया ही नहीं । और आज पहले दिन ही ? मामला कुछ समझ नहीं आया।
 
अरे सागर इतने सारे सवाल! एक साथ, पहले से सोच कर बैठे थे क्या?
 
नहीं यार, रास्ते भर तुम्हारे बारे में ही सोचता हुआ आ रहा था। शायद इसलिए खैर मेरे सवालों का जवाब दो।
 
अरे कुछ नहीं एक महीने घर पर बैठे बैठे बोर हो गई थी। इस बार पापा को अपने काम से फुर्सत नहीं मिली, दीदी और मम्मी से लड़ाई हो गई तो वो रूठ कर बैठी हुई थीं। उन्होंने मुझसे पिछले पंद्रह दिनों से बात नहीं की। कल घर से लौटकर आने लगी तब भी उन्होंने मुझ से बाय नहीं बोला। हां, मेरे मामा मुझे रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जरुर आए थे। मेरा छोटा भाई बहुत रो रहा था। बोल रहा था दीदी मत जाओ। क्या करती, समझा कर आना पड़ा।
 
बस अक्षरा का इतना ही कहना हुआ था कि आंखों में आंसू आ गए थे। वह तेजी से मुंह फेर कर क्लास की तरफ चली गई।
और सागर बेसुध सा खड़ा कुछ सोच पड़ गया। वो जो सोच रहा था, शायद वही था या फिर अक्षरा ने सच बोला था।
 
ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया, हवाओं ने सर को सहलाना बंद कर दिया, सारी संवेदनाएं भावनाएं मन में उमड़-घुमड़ कर मंथन कर रही थी। एक सुनामी सागर की जिंदगी में दस्तक देने के लिए तैयार बैठी थी।
 
कुछ था जो बुला रहा था। पुकार रहा था। आवेग को विवेक के प्रतिमान से रोक रहा था। पर कदम सारे बंधनों को तोड़ कर अपने आप चले जा रहे थे और राह-राह पूछते जा रहे थे, बताते जा रहे थे। सारी गणित गुणा भाग में सिमट कर अपना अस्तित्व बचाए हुए थी।
 
इस बबंडर को रोकने की पूरी कोशिश हो रही थी। तरह-तरह के शास्त्र अपने-अपने शस्त्र थामे खड़े हुए थे। इस तरह की कोशिश करने वालों में कई साहित्यकरों की रचनाएं आकर सूचित कर रही थी। लेकिन उनकी रचनाओं की प्रभावशील अभिव्यक्ति भी सागर में उठ रहे तूफान को थामने में असमर्थ थे । 
वही हुआ जैसे ही क्लास में पहुंचा तो अक्षरा के मासूम चहेरे को देख कर मन में उठ रही तरंगो ने अपने स्तर को कम करते हुए विचलित हलचलों को फिर थाम लिया।
 
कैसे एक इशारे पर सागर में बन रहे भयंकर हालात को थाम लिया। आखिर कौन है जो आज मचल रहा है बंधनों से छूट कर आजादी पाना चाहता है। आजादी की अभिव्यक्ति सब कुछ सच कहने की। बेमानी का रिश्ता है या नहीं। है तो क्यों? और नहीं है तो क्या अस्तित्व है इसका?
 
३.
कक्षा में अक्षरा कुछ लिख रही थी सागर भी उसके पास जाकर बैठ गया।
क्या लिख रही हो अक्षरा ?
कुछ नहीं एक एप्लीकेशन देना है ।
एप्लीकेशन किस बात की?
खामोशी............!
कागज फोल्ड करते हुए अक्षरा ने सागर से पूछा चाय पीने चलोगे?
चाय,पर तुम्हें तो चाय पसंद नहीं।
अरे, अब मैं भी तुम जैसी ही हो गई हूं, तुम्हारी तरह कोई नहीं है मेरा इस दुनिया में। सभी धोखेबाज निकले सब छोड़ कर चले गए सागर और मैं सब को छोड़ कर आ गई।
सागर चल रहे हो या नहीं।
नहीं, हां, नहीं हां चल रहा हूं।
तो फिर चलो....
 
अक्षरा उठ कर क्लास से बाहर निकलते वक्त अपनी लिखी एप्लीकेशन को बैग में रखते वक्त गिराती हुई चली जाती है।
सागर.....उसको उठाता है और जैसे ही अक्षरा की तरफ उस एप्लीकेशन को देने के लिए बड़ता है, अक्षरा तेजी से उसके दुसरे हाथ वाला कागज ले लेती है।
सागर कुछ बोलता है उससे पहले वो उस कागज को एप्लीकेशन समझ कर अपने विभागाध्यक्ष को दे आती है। इधर सागर उसकी लिखी हुई एप्लीकेशन को पढ़ कर दंग रह जाता है।
 
अक्षरा जाने वाली है। हमेशा के लिए कॉलेज छोड़ कर। हमेशा के लि‍ए सागर को छोड़ कर। क्योंकि उसको उसके मां-बाप हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए थे, उसकी दीदी उसको हमेशा के लिए छोड़ कर चली गई थी। एक भाई आठ साल का था उसके पास, वो अपनी खुशी के लिए उसको छोड़ कर उससे दूर नहीं रहना चाहती थी। वो वापस अपने घर नागपुर जाने वाली थी। अपने घर। उसके मामा ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। एक महीने में सबकुछ बदल चुका था। एक सपना, एक जिंदगी सबकुछ ...
 
एक आवाज अक्षरा की आती है सागर तुम्हें सर बुला रहे हैं। सागर सागर सागर सागर...
क्या हुआ, क्या है ये, मेरी एप्लीकेशन पर वो तो ????
 
कैसे हुआ यह सब?
 
अक्षरा.....(धीरे से) : कार एक्सीडेंट...मेरा नागपुर पहुंचना था और मुझे लेने के लिए वो स्टेशन आने वाले थे पर किस्मत कुछ और मंजूर था।
सागर ......एक कड़क आवाज...सामने विभागाध्यक्ष थे।
सागर क्या है ये ?
 
अक्षरा : क्या हुआ सर ?
खुद ही पढ़लो (हाथ में कागज थमाते हुए)
सागर चुप था।
 
अक्षरा कागज पढ़ने के बाद : सागर तुमने देर कर दी। अब कुछ नहीं हो सकता।
सागर तब भी चुप था।
सबकुछ शांत था।
 
तूफान उठकर फिर थम गया था। नाविक को तूफान में नैया संभालना आ गई थी। वो जान गया था। समय क्या कहना चाहता है।
आज तो मैं तुम्हें माफ कर रहा हूं पर आगे से ऐसा कुछ मत करना ।
 
4.
बीत गए पच्चीस साल...तालियों की गूंज में फिर एक कहानी का अंत। नागपुर साहित्य सम्मलेन में एक ही नाम गूंज रहा था। सागर सागर सागर।
फिर एक आवाज थी।
"सागर बधाई हो तुम जैसा कहते थे, वैसा कर चुके हो, तुम बन चुके हो। तुम्हारी वजह से मैं अमर हो गई। तुम्हारी वजह से मुझे एक पहचान मिली।
 
काश मैंने फैसला बदल लिया होता। पर फैसला अगर बदल लिया होता तो शायद तुम यहां नहीं होते और मैं तुम्हारें अक्षरों की अक्षरा नहीं बन पाती।
 
तुम्हारी अक्षरा कल भी अकेली थी, आज भी अकेली है। तुम्हारा इंतजार करते-करते बाल जरुर सफेद हो गए। पर मेरी आंखे थकी नहीं। तुम एक दिन आओगे पूरा विश्वास था ।"
 
मंच पर अक्षरधाम अनाथ आश्रम की एक संस्थापक का कबूलनामा व्यक्त किया जा रहा था। और बोलने वाली अनाथ आश्रम की संस्थापक ही थी।
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