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कहानी : और जिंदगी हार गई

राकेशधर द्विवेदी
बैशाख की सन्नाटेभरी दोपहरी, कभी एड़ी तो थोड़ी देर पंजे को ऊंचे करके चलते वो बस स्टैंड के अहाते में स्‍थित एक छोटे से टीन शेड के नीचे खड़ा हो गया।


 

 
क्षणभर बाद थकान और पीड़ाभरी निगाह उसने सामने भुट्टे बेचते हुए लड़के की ओर देखकर घुमाई- भैया, जरा भुट्टा दे देना। देख लेना कि भुट्टा पूरी तरह भुना हुआ है। और हां, नमक और मिर्च भी लगा देना। 
 
एड़ी के बल चले आ रहे आकृति के क्रिया-कलाप को बड़ी देर से देख रहा भुट्टा बेचने वाला नवयुवक अपने को संयत नहीं कर पाया और धीमे से आर्द्र भाव से बोला- बाबा, यह क्या? पैरों में जूते तो डाल लिए होते, ऐसी तेज धूप में नंगे पैर? जूते कहां गए आपके?
 
जूते, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी गर्दन ऊंची करके भुट्टे बेचने वाले की ओर देखा और शरीर के भार को पैर पर टिकाते हुए कहा- बेटवा, जबसे किसानी करना शुरू किया, पैर के जूते अंतर्ध्यान हो गए।
 
भुट्टे खाने के पश्चात वह तरबतगंज तहसील की तरफ जाने वाली बस में सवार हो गया। बस यात्रियों से ठसाठस भरी थी। उसने सूट-बूट पहने एक यात्री से कहा- बाबूजी, थोरे से जगह दै दैयों तो हमहू बैठ जाई। और साहब ने उसकी तरफ आंखों तरेरा और वह डरकर बस के फर्श पर बैठ गया। 
 
टूटी-फूटी सड़कों पर उछलती हुई बस थोड़ी देर में तरबतगंज पहुंच गई। वहां से 5 किमी दूर कच्ची सड़क पर उसका गांव चौबेपुर था। कच्ची सड़क पर आधे घंटे की यात्रा करने के पश्चात वह अपने घर के दरवाजे पर पहुंच गया।
 
पुराने जमाने का खपरैल का मकान, लेकिन बड़े-बड़े नक्काशीदार दरवाजे यह बता रहे हैं कि किसी जमाने का बड़ा आदमी है। आज भी वह अपने गांव में 'लम्बरदार' के नाम से जाना जाता है। पूरा नाम है- रामभरोसे लम्बरदार। रामभरोसे लम्बरदार के पुत्र का नाम है, रामखेलावन और पत्नी का नाम सीतादेवी। पुत्री का नाम पार्वती। परिवार के सभी सदस्यों के नाम सुनकर ऐसा लगता है कि सारा का सारा देवत्व सिमटकर यहां आ गया है।
 
रामभरोसे की उम्र 40 के आसपास होगी, लेकिन बाल सन की तरह सफेद हो गए हैं। अपनी उम्र से 20 साल ज्यादा बूढ़ा दिखता है व पत्नी भी झुर्रियों व अधपके बाल वाली है। हमेशा खांसती रहती है व लगता है कि दमे की मरीज है। 
 
रामखेलावन ने 12वीं कक्षा की परीक्षा विज्ञान से दी है। गणित का मेधावी छात्र है। रामखेलावन को इंजीनियर बनाना चाहते हैं रामभरोसे। आखिरकार बनाएं भी क्यों न, बगल के गांव के प्रधान बलरामजी का लड़का विनोद 15 वर्ष पूर्व पीडब्ल्यूडी का इंजीनियर बन गया था और आज पूरे इलाके में सबसे संपन्न आदमी है बलराम प्रधान। कई गाड़ियां, कई ट्रैक्टर, जनरेटर, ट्यूबवेल और क्या नहीं है बलराम प्रधान के पास। 
 
किसी जमाने में 25 एकड़ के किसान होते थे बाबू बनवारी लाल। रामभरोसे के पिता, लेकिन घटते-घटते 25 एकड़ की जोत 10 एकड़ सिमटकर रह गई और पिछले वर्ष कैंसर से लड़ते-लड़ते स्वर्ग सिधार गए। मृत्युभोज में रामभरोसेजी ने दिल खोलकर खर्च किया। सिरिया दान किया। गाय-बैल व अनेक जानवरों का दान किया। हजारों आदमियों ने भोजन किया। मृत्युभोज कराने में रामभरोसे की कमर टेढ़ी हो गई, लेकिन लम्बरदार ने मूंछ नहीं नीची होने दी।
 
 
 

पिछले 3 साल से खेत में गन्ने की फसल बोई जा रही है। गन्ने की फसल की लागत डीजल के दाम बढ़ जाने की वजह से काफी बढ़ गई है। गन्ना एक बार बोए जाने पर 3 साल तक काटा जाता है। हर साल पैदावार पहले के साल से 10 प्रतिशत कम होती है, लेकिन पैसे नकद मिल जाते हैं। मिल भी ज्यादा दूरी पर नहीं है। मात्र 15 किमी की दूरी पर है मेजापुर में तो लाने-ले जाने का खर्च कम ही लगता है।
 
पिछले 3 साल से गन्ने को मिल में पहुंचा दिया गया है। साढ़े 3 लाख से ज्यादा का भुगतान मिल से होना है, लेकिन मिल वाले हैं कि कान में रुई डालकर बैठे हैं। साढ़े 3 लाख की भुगतान की रसीद उसके पास थी। रोज धरना-प्रदर्शन मिल के गेट पर होता है, सरकार द्वारा रोज आश्वासन दिया जाता है, लेकिन पैसा मिलने का कोई रास्ता नहीं खुल पा रहा है। रात का अंधियारा घर में पसरा हुआ है। 
 
उसने अपनी पत्नी सीतादेवी से कहा- साढ़े 3 लाख रुपए का भुगतान मिल से होना बाकी है, मिल जाएं तो बिटिया के हाथ पीले कर देई, उई 18 वर्ष की होए आई है। तुम्हारा उई बात सुनत-सुनत हमार कान पक गए। आज भुगतान होई रहा है, कल होई रहा है, तोहरे पास गन्ने भुगतान की पर्ची है, ओहका मढ़ाय के रख लेव। सीतादेवी ने तुनककर कहा। आस छोड़ दिहेन मिल से भुगतान के। अगर मिल से पैसा मिल जाए तो समझो गंगा नहाएन। और वह अपना सा मुंह लेकर चादर में मुंह ओढ़कर सो गया।
 
सुबह वह पुन: मिल के दरवाजे पर खड़ा आषाढ़ का दूसरा पखवाड़ा या जून के अंतिम दिनों तक बैशाख जैसा तपता सूर्य और साफ आसमान। मिल के गेट पर चिंता का पसरा मौन तथा गली-चौराहे में अनिश्चित भविष्य की मानसिकता से ग्रसित रुग्ण चलती-फिरती मानवीय किसानों की आकृतियां। मिल के दरवाजे पर एसडीएम ने ताला लगवा दिया है। पैराई बंद हो गई है। दरवाजे पर खड़े पुलिस वालों ने बताया कि मिल मालिक भागकर विदेश चले गए हैं। अब हाई कोर्ट के ऑर्डर से पैसा मिलेगा। भैया कोर्ट-कचहरी का मामला है। पैसा मिलना इतना आसान नहीं है। जब मिल जाए तो हनुमानजी को वस्त्र चढ़ा देना। पुलिस वाला धीरे से बुदबुदाया। 
 
वह अपना-सा मुंह लेकर गांव की तरफ चल दिया और गांव के पास घने बरगद की छत तले ओटले पर स्थित शिव मंदिर पर जाकर बैठ जाता है। वह धीरे से बुदबुदाता है- 
 
हे भोलेनाथ, किस अपराध की सजा आप हम गरीबों को दे रहे हो। बचपन से मैं धर्म के रास्ते पर चल रहा हूं। हमेशा लोगों को जिंदगी देने का काम किया है, तो मुझसे मेरी जिंदगी क्यों छीनी जा रही है। 
 
वह बड़ी देर तक मंदिर पर बैठा रहा, फिर लाठी टेकता थके पांवों से मुंह लटकाए घर की तरफ चल दिया।
 
कुछ बताया मिल वालों ने कि कब तक पैसा देहे? तुम तो कह रहे थे कि आज पता चल जाएगा। सीतादेवी ने उलाहनाभरे शब्दों में कहा। 
 
वह कुछ नहीं बोला। उसने सिर खटिया पर रख दिया तथा बूंदें टपकाने का प्रयास कर रही छोटी-छोटी आंखों को जोरों से भींच लिया।
 
वह मन ही मन बुदबुदाया कि दुख है कि कटने का नाम ही नहीं लेते। और वह सो गया। 
 
वह सुबह उठकर नहा-धोकर पंचायत की दालान पर बैठा ही था कि किसी ने सलाह दी कि अरे ग्रामीण बैंक काहे नहीं जाते। वहां तुम्हें लोन मिल जाएगा और अबकी बार गेहूं बोएंगे। 
 
वह फिर से सारे देवताओं को याद कर ग्रामीण बैंक के दरवाजे पर खड़ा था। 
 
ब्रांच मैनेजर ने धीरे से पूछा- काहे खातिर आए हो लंबरदार? 
 
वह धीरे से बुदबुदाया- बाबूजी, लोन लेएक है। 
 
बैंक मैनेजर ने पूछा- कितने बीघा खेत हैं? 
 
10 एकड़ पक्के हैं। 
 
बैंक मैनेजर ने धीरे से कहा- 2 बीघा गिरवी रख दो और 2 लाख का लोन उठा लो। फिर मु्स्कुराते हुए कहा कि कुछ प्रोसेसिंग फीस भी लगती है। राजनारायण चपरासी तुम्हें बता देगा। 
राजनारायण ने बताया कि 10 हजार रुपए तुम्हें साहब को देने होंगे। 
 
उसकी 
आंखों में खून आ गया, लेकिन और कोई विकल्प नहीं था। उसने 10 हजार की व्यवस्था और लोन सेक्शंग करवाया। गेहूं बो दिया गया। रामभरोसे गेहूं देखकर खुश होता। अबकी बार गेहूं अच्छा होई सीतादेवी। अरे और नहीं का हमेशा हमार भाग्य खराब रही। 
 
गेहूं की फसल अब बड़ी हो गई थी। जैसे राजमिस्त्री अपने बनाए घर को देखता है, सुनार अपने जेवरों को देखता है, वैसे ही वह गेहूं कि लहलहाती हुई फसल को खुश होकर देखता है। 
 
सीतादेवी उसके साथ गेहूं की फसल को देख रही थी। उसने धीरे से कहा- रामखेलावन की अम्मा, अबकी बार भगवान हमार सुन लेहे।
 
काहे नाही, हम कौन दोष किहन है जौन हमार हर बार न सुनी जाइ, सीतादेवी ने कहा। खरतापवारनाशक, कीटनाशक दवा कल बाजार से लै आई। खरपतावार और कीटों का डर अभी बना है। अगले दिन वो कीटनाशक दवा ले आया।
 
गेहूं कटने वाला है। लेकिन ये क्या? आकाश में बादल घिरने लगे। जैसे भादौ की रात में गरजते हैं, वैसे ही गरज रहे हैं बादल। सीतादेवी ने रामभरोसे से कहा कि यदि ये बरस गए तो सारा सत्यानाश हो जाएगा। और वो बड़ी तेजी से सारे देवताओं को याद करने लगा- हे शंकर भगवान, हे संतोषी माता, हे हनुमानजी, हे दुर्गा माई, आज न बरसाओ। 
 
लेकिन ये क्या? बादल अब बहुत तेजी से बरस रहे थे और ओले भी गिर रहे थे। ऐसी भीषण बारिश हो रही थी कि भादौ की बारिश भी शरमा जाए। वो रोने लगा। रामभरोसे को रोता देख सीतादेवी भी रोने लगी। रामभरोसे जोर से चिल्लाया- सब लुट गया। 
 
रात का अंधेरा समाप्त हुआ। मुर्गे कुकडू-कू करने लगे। वो बड़का पछलहरा में ही खेत पर पहुंच गया। उसके हाथ में एक छोटी सी टॉर्च थी। गेहूं की सारी बालिया खेत में औंधे मुंह पड़ी थीं। सारा इलाका जलमग्न था। लाखों की फसल कौड़ियों में तब्दील हो गई थी।
 
वो विचारों में खोया था। सरकार किसानों के लिए कोई उत्कृष्ट बीमा क्यों नहीं लाती? मोटर का बीमा, जानवर का बीमा है, आदमी का बीमा है, फिर फसल का भी उत्तम किस्म का बीमा क्यों नहीं होना चाहिए? किसान की फसल, किसान की जिंदगी है। जब हर 10 साल में सरकारी बाबुओं की तनख्‍वाह बढ़ रही है, पे कमीशन आ रहा है, तो किसान की फसल की क्यों नहीं उसी अनुपात में सरकारी क्रय मूल्य में वृद्धि हो रही है? सोचते-सोचने वह खेत की गीली मिट्टी पर बैठ गया। उसे याद आया कि चलें, बैंक मैनेजर से बात करें। आखिरकार लोन लिया तो उसकी किस्त तो देनी होगी। अब फसल खत्म तो लोन कैसे चुकेगा?
 
थोड़ी देर में वो बैंक मैनेजर के सामने था। मैनेजर साहब ने देखकर कहा- आओ लम्बरदार। गेहूं तो बर्बाद हो गया। वो बुदबुदाया, अरे नहीं सरकार, गेहूं नहीं हम बर्बाद हो गए। 
 
मैनेजर बुदबुदाया, अरे भाई तुम तो ग्राम्य देवता हो और जहर दतो देवता को ही पीना पड़ता है। अंग्रेजी में तुम्हारा नाम फार्मर है अर्थात मरने के लिए। वह बुत बना सुनता रहा। 
 
सरकार हमारे खेतों की नीलामी नहीं होनी चाहिए, खेत गिरवी है।
 
ठीक है हम कुछ रास्ता निकालेंगे, पर भाई बैंक की किस्त तो तुमको भरनी पड़ेगी। 
 
वो बिना कुछ बोले वापस आ गया। उसके कानों मैं बैंक मैनेजर के शब्द गूंज रहे थे- 'तुम देवता हो और विष तो महादेव को ही पीना पड़ता है।' 
 
उसने जल्दी से कीटनाशक दवाई उठाई और पानी में मिलाकर पी लिया और थोड़ी देर में उसका शरीर निस्तेज होकर जमीन पर लुढ़क गया। 
 
उसके प्राण-पखेरू उड़ गए थे। और ऐसा लग रहा था कि जैसे जिंदगी हार गई हो। 
 
(इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं। इसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है।) 
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