Dharma Sangrah

लघुकथा : बारिश वाली रात

डॉ मधु त्रिवेदी
रवि को फिर वही रात याद आ गयी। मूसलाधार बरसात हो रही थी और सांझ ने यह कहते हुए "आओ मेरे पास, बहुत भीग गए हो, कुछ ताप दूं तुमको... उसे अपनी कोख में छिपा लिया था। रवि, जिसकी सर्दी से हृदय धड़कन बढ़ गई थी यह कहते हुए, सांझ ! मुझे दुपका लो अपने हृदयतल में। सांझ में समा गया था । अंग से अंग सटाए दोनों को आभास न हुआ कब रात हुई और कब सुबह।

 
सूर्य आकाश में अपनी रश्मियों के साथ चमक रहा था वहीं किरणें उन दोनों पर पड़ रही थी। सांझ ने झकझोरते हुए कहा, " रवि, उठो। मां याद कर रही होंगी, उठो और जाओ घर। 
       
रवि चलता गया, कदम बढाने के साथ-साथ सांझ के साथ बिताए पल भी आगे ही आगे बढ़ते जा रहे थे। जवानी भी किसी रूप सी कम नहीं होती, जो अपने अंग -प्रत्यंग की खुशबू दूसरे में बसा जीना दुश्वार कर देती है और कल्पनालोक के संसार में विचरण करने को मजबूर कर अपने को किसी राजकुमार से कम भास नहीं कराती।
       
कालेज से घर के रास्ते को लौटते हुए रवि की निगाह बरबस उस इमारत पर टिक जाती थीं, जो मुगलकाल में बनी थी। जहां रवि और सांझ का प्रथम प्रणय शुरू हुआ था।
       
प्राय: होठों से बुदबुदाते हुए मुस्कराहट के साथ पुकार बैठता था "सांझ, तुम कहां हो, कब आओगी "पर सांझ की अनुपस्थिति में एक आवाज अंतस से आती और गूंज उठती -"रवि ! रवि ! मैं यहीं तुम्हारे पास हूं और हमेशा, हमेशा के लिए । 
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