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अपशगुन

लघुकथा

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ज्योति जै न

सुबह-सुबह सड़क बुहार रहे जनसेवकों से बचने के लिए अपनी धोती उठाकर बचते आ रहे कमल बाबू अचानक ही आपे से बाहर हो गए। सामने विधवा जमादारनी हीरा जो नजर आ गई थी। घूमने वाली साथी सोनीजी से बोले - 'आज तो अपशगुन हो गया कमबख्‍त! ये कलमुँही सामने पड़ गई।'

अक्सर उनके ताने सुनती हीरा दुखी हो सोच रही थी।' बड़े अपशगुन तो आप हैं सेठ जी! उस दिन सुबह-सुबह आपको ही देखा था जिस दिन मेरा शामू चेम्बर में उतरा तो वापिस नी आया। भगवान सुबह-सुबह किसी को आपका मुंडा नी दिखावे। और फिर वह कमल बाबू की ओर पीठकर झाड़ू देने लगी।

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