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गोपनीय

लघुकथा

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विजय बजा ज
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उस सरकारी दफ्तर में जाते हुए मुझे काफी समय हो गया था। जब भी उस दफ्तर से हमारी फर्म का कोई काम अटकता, लिफाफा लेकर मुझे ही जाना होता। वहाँ के लोग तो लोग, कुर्सी-मेजों तक से मेरी पहचान हो गई थी।

अजूबा थी तो केवल एक अलमारी, जिसके पास सुबह आते ही उस दफ्तर के अधिकांश कर्मचारी रुकते, बड़े साहब, बाबू लोग और भृत्य भाई, सब कुछ क्षण वहाँ कुछ करते तब जाकर सीट पर बैठते, मुझे लगा कि वहाँ कोई मूर्ति रखी होगी। काम शुरू करने से पहले सब भगवान का नाम ले लेते होंगे ताकि दिनभर के पाप धुल जाएँ।

मैंने सबसे पूछा लेकिन किसी ने कुछ बताया नहीं, गोपनीय कहकर टाल दिया। अब भला जिस दफ्तर में रिश्वत के रुपए भी अच्छी तरह गिनकर लिए जाते हों वहाँ भला गोपनीय क्या होता होगा। अचानक एक दिन दफ्तर से निकलते समय वहाँ नए आए मुकुल बाबू मिल गए।

मैंने अपना प्रश्न उन पर दाग दिया। वो शायद नहीं जानते थे कि इसे गोपनीय रखना है, बोले - अरे आपको नहीं मालूम, इस अलमारी में हर कर्मचारी सुबह अपनी-अपनी शरम बंद करके रख देता है ताकि दिनभर कामकाज करने में दिक्कत न हो। शाम को घर लौटते समय सब अपनी-अपनी शरम ओढ़ लेते हैं।

पर कुछ लोग तो सुबह अलमारी के सामने नहीं रुकते - मैंने अपनी जिज्ञासा प्रकट की। उन लोगों को शरम की जरूरत दिनभर ही नहीं पड़ती इसलिए वो उसे घर में ही छोड़ आते हैं - मुकुल ने समाधान किया।

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