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ठंडक

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- नीता श्रीवास्तव

SubratoND
गर्मागर्म फूली रोटी की भाप... जान निकल गई उनकी। लेकिन पति सिसकारी सुनने के बावजूद कुछ न बोले। दोहरा दर्द... अपनी पीड़ा से अपने ही नयन भरें... ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था उन्होंने।

बिस्तर पर पहुँचीं तो बरनॉल ट्यूब लेकर... एक आस लेकर। अब तो देखेंगे- पूछेंगे जख्म को... पूरा अँगूठा जलन से दहक रहा था। अंततः क्रीम लगाते हुए खुद ने ही बात शुरू की- 'रोटी की भाप हो या गर्म तवा-कड़ाही... जरा सा चेट जाने पर कितनी जलन होती है... सोचकर ही डर लगता है... मेरे मरने के बाद आप तो मुझे दफना देना... जलाना मत प्लीज।

सुनते ही पति ठहाका मारकर बोले- 'क्यों बकवास करती हो... मरने के बाद न डर लगता है न दर्द होता है। तुम तो मर जाओगी... जान ही नहीं पाओगी कि तुम्हें गाड़ा या जलाया...?'
  गर्मागर्म फूली रोटी की भाप... जान निकल गई उनकी। लेकिन पति सिसकारी सुनने के बावजूद कुछ न बोले। दोहरा दर्द... अपनी पीड़ा से अपने ही नयन भरें... ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था उन्होंने।      


उफ्‌... उनके सुलगते तन-मन पर अंगारे बरस पड़े। एक आस... एक चाह थी जो जलकर राख हो गई। काश... पतिदेव दो मीठे बोल... बोल देते तो कलेजे तक ठंडक पहुँच जाती।
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