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- नीता श्रीवास्तव

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अकेली जान... झोंपड़ी में कमर तक पानी... बच्चों को बचाने में, न एक भी दाना बचा पाई न एक भी बर्तन ठीकरा... सब बह गया... गल गया।

मेहनती थी पुनः जुट पड़ी दो जून की रोटी कमाने... किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए। तभी बस्ती में खबर फैली- बाढ़ पीड़ितों को राहत राशि मिलने की। खबर पक्की है... जानने के लिए बस्ती में आने वाले एक अधेड़ कांस्टेबल से ही पूछ बैठी- 'दरोगा साब... हमारी झुपड़िया में भी पानी भरा था.. हमें भी देगी सरकार मदद?'

- हाँ... क्यों नहीं। तू तो अकेली है, तेरी मदद सरकार को ही क्या... सबको करना चाहिए। मैं करूँगा तेरी हेल्प... मुझसे बोलना।'

गद्गद् हो गई वह... दो मीठे बोल का सहारा पाकर तर गई। हाथ जोड़ती... आभार मानती बढ़ी ही थी कि- 'पूरी बात तो सुन ले मेरी 'फ्रंटियर मेल'... जैसे तू अकेली है... मैं भी तो अकेला ही हूँ यहाँ... बीवी-बच्चे तो सब गाँव में हैं। आ जाया कर कभी-कभी...।'

उसके पैरों तले धरती खिसक गई। कितना अच्छा होता... उस रात बाढ़ में वह भी डूब गई होती।

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