तात्या टोपे : मातृभूमि के लिए न्यौछावर किए प्राण

तात्या टोपे की याद दिलाती है वीरान कोठरी

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सन्‌ 1857 की क्रांति के वीर अमर शहीद तात्या टोपे को शिवपुरी नगर में 18 अप्रैल 1859 को फांसी की सजा सुनाई गई थी। इसी दिन वे फांसी का फंदा अपने गले में डालते हुए मातृभूमि के लिए न्यौछावर हो गए थे।

फांसी स्थल पर आज भी तात्या टोपे की विशाल प्रतिमा हाथ में तलवार लिए खड़ी है। प्रतिवर्ष शिवपुरी में 18 अप्रैल को उस अमर शहीद को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी जाती है। नगर की उप जेल में कोठरी नं. 4 और कलेक्टर कार्यालय के निकट एक वीरान कोठरी तात्या की याद दिलाती है।

तात्या टोपे को श्रद्धांजलि देते हुए राष्ट्रीय कवि स्व. श्रीकृष्ण 'सरल' ने लिखा था-

' दांतों में उंगली दिए मौत भी खड़ी रही,
फौलादी सैनिक भारत के इस तरह लड़े
अंगरेज बहादुर एक दुआ मांगा करते,
फिर किसी तात्या से पाला नहीं पड़े।'

तात्या टोपे की वीरता पर विदेशी इतिहास कोश में 'मालसन' ने लिखा था-
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' संसार की किसी भी सेना ने कभी कहीं पर इतनी तेजी से कूच नहीं किया, जितनी तेजी से तात्या की सेना कूच करती थी। उनकी सेना की बहादुरी और हिम्मत के बल पर ही तात्या ने अपनी योजनाओं को पूरा करने का प्रयत्न किया। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।'

श्रीमती हेनरी ड्यूबले भी लिखती हैं- 'उन्होंने जो अत्याचार (अंगरेजों पर) किए उनके लिए हम उनसे घृणा करें, किंतु उनके सेना नायकत्व के गुणों और योग्यता (देशभक्ति) के कारण हम उनका आदर किए बिना नहीं रह सकते।'

तात्या टोपे को शिवपुरी-गुना के जंगलों में सोते हुए धोखे से 7 अप्रैल 1859 को पकड़े गए। बाद में अंगरेजों ने शीघ्रता से मुकदमा चलाकर 18 अप्रैल 1859 को राष्ट्रद्रोह में तात्या को फांसी की सजा सुना दी।

इस पर तात्या टोपे ने अपने बयान में कहा था- 'मेरे पेशवा राजा हैं। उनका कारिन्दा होने से मैंने उनके आदेशों का पालन कया। मैंने अपने राजा का हुक्म मानने से मैं राष्ट्रद्रोही नहीं हो सकता।'

तात्या टोपे (रामचंद्र) द्वारा गुना जिले के चंदेरी, ईसागढ़ के साथ ही शिवपुरी जिले के पोहरी, कोलारस के वनों में गुरिल्ला युद्ध करने की अनेक दंतकथाएं हैं।

- प्रेमनारायण नागर

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