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Saint Taran Taran: मंडलाचार्य तारण तरण स्वामी का गौरवशाली इतिहास

वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
शुक्रवार, 8 मई 2026 (11:35 IST)
Gurpurvi 2026 Date: संत तारण तरण स्वामी की जयंती को उनके अनुयायी 'गुरुपर्वी' या 'तारण जयंती' के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास और आध्यात्मिक भक्ति के साथ मनाते हैं। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि तारण पंथ के अनुयायियों के लिए आत्म-चिंतन और गुरु के बताए 'मोक्ष मार्ग' पर चलने के संकल्प का दिन है।
 
बुंदेलखंड की माटी में जन्मे एक ऐसे महापुरुष, जिन्होंने न केवल अध्यात्म की गहराई को छुआ, बल्कि 'तारण पंथ' के माध्यम से हजारों आत्माओं को मोक्ष का मार्ग दिखाया। यहां हम बात कर रहे हैं मंडलाचार्य संत तारण तरण स्वामी की, जानें तारण पंथ के प्रणेता संत तारण तरण स्वामी के बारे में...
 

पुष्पावती से शुरू हुआ एक आध्यात्मिक सफर

वि.सं. 1505 का जेठ वदी छठ वह पावन दिन था, जब पुष्पावती (बिलहरी) में गढाशाह जी और माता वीरश्री देवी के आंगन में एक दिव्य ज्योति का अवतरण हुआ। बचपन से ही वैराग्य की ओर झुकाव रखने वाले तारण स्वामी ने मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में सम्यक दर्शन प्राप्त कर लिया था।
 
21 वर्ष: ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया।
 
30 वर्ष: सप्तम प्रतिमा के साथ साधना को और गहरा किया।
 
60 वर्ष: जैनेश्वरी दीक्षा लेकर पूर्ण वीतरागी दिगंबर संत बन गए।
 

क्या है 'तारण पंथ'?

तारण स्वामी ने महावीर की वीतराग परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 'तारण पंथ' की स्थापना की। इसका सीधा अर्थ है—'वह पंथ जो संसार सागर से पार उतार दे'। 151 मंडलों के आचार्य होने के कारण उन्हें श्रद्धा से 'मंडलाचार्य' पुकारा जाता है। आज पूरे भारत में इस पंथ के 4 मुख्य तीर्थ और 115 से अधिक भव्य चैत्यालय उनकी शिक्षाओं का प्रसार कर रहे हैं।
 

ज्ञान का अनमोल खजाना: 14 ग्रंथ

उन्होंने अपनी साधना के अनुभव को 14 महान ग्रंथों में पिरोया, जिन्हें विचार, आचार, सार, ममल और केवल मत जैसे पांच मुख्य भागों में बांटा गया है। इन ग्रंथों का मूल सार जैन धर्म के तीन स्तंभ हैं: सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र।
 

बेतवा का वह जादुई टापू: मल्हारगढ़ की निसई जी

वि.सं. 1572 में, 66 वर्ष की आयु में, अशोकनगर के मल्हारगढ़ में बेतवा नदी के तट पर उन्होंने सल्लेखनापूर्वक समाधि धारण की। आज यह स्थान किसी चमत्कार से कम नहीं है:
 
नदी के बीच टापू: गुरुदेव का समाधि स्थल बेतवा नदी के बीचों-बीच एक टापू पर स्थित है।
 
आस्था की नाव: हजारों श्रद्धालु आज भी नावों में सवार होकर लहरों को पार करते हैं और गुरु चरणों (पादुकाओं) की वंदना करने पहुंचते हैं।
 
निसई जी महोत्सव: 10 एकड़ में फैला यह परिसर और यहां लगने वाला मेला, श्रद्धालुओं के लिए आस्था और शांति का केंद्र है।
 
निष्कर्ष: संत तारण तरण स्वामी का जीवन हमें सिखाता है कि आडंबरों से दूर रहकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर कैसे बढ़ा जाता है। 
 
'मल्हारगढ़ की पावन धरा, बेतवा का किनारा। तारण तरण गुरु हमारे, मोक्ष मार्ग का सहारा।'

ज्ञात हो कि संत तारण तरण गुरुपर्वी ज्येष्ठ (जेठ) वदी छठ को पर्व का मुख्य आयोजन म.प्र. के निसई जी (मल्हारगढ़), पुष्पावती (बिलहरी), सेमरखेड़ी और देश भर के सभी तारण चैत्यालयों में होता है।
 
 
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