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बाल कविता : बिल्ली मौसी

शम्भू नाथ
भूखी-प्यासी बिल्ली मौसी
क्या इसको दूध पिलाऊं मां
कई दिनों से नहीं नहाई 
क्या इसको नहलाऊं मां


 
चली गई थी मिलने अपने
सास-श्वसुर और बेटों से
भरा-पूरा परिवार देख कर
लेट गई थी रेतों पे
इसकी हालत देख के तेरी
मुनिया है अकुलाई मां
भूखी...
 
पाला पड़ा था उन कुत्तों से
गली-गली में भागी थी
बच गई ये भाग से अपने
जो कि बड़ी, अभागी थी
खून टपकते बदन पे इसके
क्या हल्दी-तेल लगाऊं मां
भूखी-प्यासी बिल्ली मौसी
क्या इसको दूध पिलाऊं मां। 


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