Dharma Sangrah

चुलबुली चंचल कविता : चींटी और चिड़िया

कृष्ण वल्लभ पौराणिक
एक कहानी बहुत पुरानी
दादी कहती मुझको
उसे सुनाता हूं मैं बच्चों
अभी-अभी तुम सबको ...1
 
पानी इक दिन बहुत गिरा था
बाढ़ नदी में आई
फैला चारों ओर जमीं पर
शामत सबकी आई ...2
जान बचाने को इक चींटी
पत्ते पर चढ़ बैठी
तैर रहा था पत्ता जल पर
हिलते डरकर बैठी ...3
 
देखी उसने चिड़िया ऊपर
एक, डाल पर बैठी
टोंच रही थी छाल वृक्ष की
ठंड से थी वह ऐंठी ...4
 
ओ! प्यारी चिड़िया तुम झटपट
इस पत्ते को ले लो
पकड़ चोंट में इसको ऊपर
वृक्ष डाल पर ठेलो ...5
 
उपकार तुम्हारा मानूंगी
मुझको कभी बचाया
और काम मैं आऊंगी मैं
चींटी ने समझाया ...6
 
चिड़िया बोली- 'ऐ! री! चींटी
तू कितनी छोटी है
काम करेगी क्या तू मेरा
अक्कल से बोठी है ...7 
 
फिर भी तुझे बचा लेती हूं
कहकर नीचे आई
पकड़ चोंच में उस पत्ते को
लेकर ऊपर आई ...8
 
चींटी चलते हुए डाल पर
विनम्रता से बोली
'धन्यवाद है चिड़िया रानी
ऋणी आज मैं हो ली' ...9
 
एक दिवस बैठी थी चिड़िया
जंगल में डाली पर
एक शिकारी वन में आया
पड़ी दृष्टि डाली पर ...10
 
चींटी यह सब देख रही थी
पहुंची चलते-चलते
चढ़ी पैर पर उस शिकारी के
मन में सोच समझते ...11
 
जब शिकारी ने तीर निकाला
साधा प्रत्यंचा पर
रखा लक्ष्य में उस चिड़िया को
आंखें उधर लगाकर ...12
 
ज्यों ही अंगुली उठी तीर से
चींटी ने काटा था
भटका तीर निशाने से फिर
औ' शिकारी कांपा था ...13
 
बचा लिया चिड़िया को उसने
हत्यारे के शर से
चिड़िया निकट चली आई
बोली चींटी निडर से ...14
 
धन्यवाद देती हूं अब मैं
नन्ही चींटी तुमको
मुझे बचा लिया है तुमने
बहुत खुशी है मुझको ...15

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