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बाल कविता : मेरा बचपन...

सुशील कुमार शर्मा
बचपन रंग-रंगीला है,
कितना लगे सुरीला है।


 
नन्ही के संग दौड़ा-दौड़ी,
मुन्नी के संग कान मरोड़ी।
 
तितली के पीछे दौड़ा मैं, 
मछली के पीछे तैरा मैं।
 
मेरा पाजामा ढीला है,
बचपन रंग-रंगीला है।
 
नानी का मैं सबसे प्यारा,
दादी का मैं राजदुलारा।
 
जब भी पापा ने डांट लगाई,
दादा ने की उनकी खिंचाई।
 
मेरा चेहरा भोला है,
बचपन रंग-रंगीला है।
 
चलो नदी में कूद लगाएं,
पेड़ों पर झट से चढ़ जाएं।
 
चलो आम पर पत्थर मारें,
करें जोर से चीख-पुकारें।
 
खेत में सरसों पीला है,
बचपन रंग-रंगीला है।
 
चलो पानी में नाव चलाएं, 
कान पकड़कर दौड़ लगाएं।
 
कक्षा में हम धूम मचाएं, 
इसको पीटें, उसे नचाएं।
 
देखो मिट्ठू बोला है,
बचपन रंग-रंगीला है,
कितना लगे सुरीला है।
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