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हिन्दी कविता : क्यों इतने महंगे स्कूल

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

पुस्तक और किताबें महंगी।
जूते और जुराबें महंगी।
शाला के परिधान कीमती।
शिक्षा का सामान कीमती
लूटपाट इतनी ज्यादा है।
कहीं नहीं अब बचे उसूल।
 
टयूशन फीस हुई मनमानी।
पैसों की ही खींचातानी।
निर्धन अब क्या करें बेचारे।
उनको देता कौन सहारे।
बड़े-बड़े स्कूल खुले हैं,
धनपतियों के ही अनुकूल।
 
शिक्षा अब व्यवसाय हो गई।
एक दुधारू गाय हो गई।
पैसे हैं तो करो पढ़ाई।
धन से डिग्री ले लो भाई।
रुतबा ताकत भाग्य बनाते।
निर्बल की किस्मत में धूल।


(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
 

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