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बाल कहानी : चम्पालाल अखबार वाला

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
मंगलवार, 23 जुलाई 2024 (16:11 IST)
चम्पालाल जी अखबार बेचते हैं। एक तरह से कह लो कि हॉकर हैं और हॉकर के लिए तो चम्पालाल अखबार बेचता है, लिखना चाहिए। लेकिन चम्पालाल ने अपना सारा जीवन ऐसे उत्कृष्ट कार्यों में लगाया है कि उन्हें सम्मान तो मिलना ही है। वैसे भी सभी छोटों-बड़ों को सम्मान मिलना भी चाहिए, पद से क्या होता है? 
सभी परिचित लोग कहते हैं- चम्पालालजी अखबार बेचते हैं। 
       
रोज सुबह नियमित रूप से सात बजे उनका अखबार वितरण कार्यक्रम प्रारंभ हो जाता है। आते ही जो भी व्यक्ति घर के पोर्च में दिख जाता हैं उससे राम-राम दुआ-सलाम अथवा राधे-राधे बोलकर उसका सम्मान करना उनका रोज का काम है। फिर घर के सब लोगों की खैरियत पूछना भी वे नहीं भूलते। सभी अखबार खरीदने वाले उनको घर का ही सदस्य मानते हैं। 
        
सुबह का वक्त तो चाय का होता है। लोग पूंछते है- 'चाय पियोगे चम्पा भाई ?'
 
'नहीं जी, चाय मैं बहुत कम पीता हूं, बस दिन में एक बार। और आज सामने वाले दादाजी ने पिला दी है।'
 
'तो ठीक कल की चाय हमारे यहां ही पीना।'
 
'जी, ठीक है। आपका आग्रह कैसे टाल सकते हैं।' इतना कहकर वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते हैं।'
 
चम्पालाल जी जिसके यहां चाय पी लेते वह अपने आप को धन्य मान लेता है। तीन-चार अखबारों की जबाबदारी उनकी है। चाहे पानी बरसे, बिजली कड़के, कड़क ठंड हो, शीत लहर चले या धुंध छाई हो चम्पालाल जी का अखबार बांटना बंद नहीं होता। जिस दिन तेज बारिश में बिलकुल भी निकलना संभव न हो तो अलग बात है  वरना बारिश जरा-सी भी कम हुई तो निकल पड़ते हैं वे। 
 
हाड़ कंपाने वाली ठंड में तो चम्पालाल जी पूरे जोकर बन जाते हैं। फुल स्वेटर, उसके ऊपर से कोट, सिर पर कनटोप और ऊपर से मोटा शाल। गले में मफलर भी लपेटा होता। फुल पायजामा के ऊपर कभी-कभी फुल पेण्ट डंटा कर आ जाते। 
 
बच्चे पूंछते 'चम्पालाल अंकल इतनी सारे कपडे!'
 
'क्या बताएं बच्चो मुझे बहुत ठंड लगती है।'
 
'तो छुट्टी ले लिया करो, जिस दिन ठंड ज्यादा हो।'
 
'सूरज कभी छुट्टी लेता क्या?, हवा छुट्टी लेती है क्या?' चम्पालाल जी हंसकर कहते। 
 
'नहीं कभी नहीं, ये तो छुट्टी कभी नहीं लेते।'
 
'तो हम क्यों लें?' बच्चों को उनसे बात करने में बहुत मज़ा आता।
 
बारह-साढ़े बारह जब सारे अखबार बांट देते तो उनका दूसरा काम चालू हो जाता। बच्चों से मेल मुलाक़ात का। एक बजे की आसपास शालाओं की छुट्टी होती और बच्चे बस, वैन अथवा ऑटो रिक्शे से घर की तरफ रवाना होने लगते तो चौराहों पर बस्ता लेकर उतरते बच्चों से वे हाय-हैलो करते और उन्हें चॉकलेट बिस्कुट अथवा टॉफी देते। बच्चों की नज़र भी बस से उतरते-उतरते चम्पालाल अंकल पर होती। अखबार बेचने पर जो भी आय होती वे सारी की सारी बच्चों पर खर्च कर देते। इतना बचा लेते कि महीने भर की दाल-रोटी चल जाए। और क्या करना धन जोड़ कर। रोज का यही नियम, सुबह अखबार, दोपहर में बच्चे। 
        
एक ही जगह बंधकर नहीं रहते थे वे। कभी शहर के इस चौराहे पर तो कभी उस चौराहे पर। हां, बच्चों वाली बस या वैन जरूर बच्चों को छोड़ने के लिए वहां रुकना चाहिए। जिस चौराहे पर चम्पालाल अंकल पहुंच जाते, उस चौराहे पर उतरने वाले बच्चों की उस दिन पौ बारह रहती। चॉकलेट-बिस्कुट बांटना तो शायद एक बहाना था, मुख्य बात तो बच्चों पर नज़र रखना भी होता था। कहीं कोई परेशानी में तो नहीं है। कई छूटे हुए बच्चों को उन्होंने उनके घर पहुंचाया है। बस खराब हुई, ऑटो खराब हुआ तो उन्होंने अपने अन्य साधनों से बच्चों को गंतव्य तक भेजा है। चम्पालाल जी को सारा शहर जानता था। 
 
एक दिन शहर के एक बाहरी चौराहे पर चम्पालाल जी अभी-अभी बच्चों को चॉकलेट बांटकर फुर्सत हुए ही थे कि एक ऑटो रिक्शा सड़क से गुजरा। उसमें एक सात आठ साल की बच्ची बस्ता लेकर बैठी हुई थी। चम्पालाल जी ने देखा कि वह बच्ची रो रही है। 
 
'अरे यह बच्ची तो रो रही है- क्यों?' उनका माथा ठनका। कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है। हे भगवान् उसकी रक्षा करना' कुछ सोचकर वे अपनी साइकिल से उस ऑटो रिक्शे के पीछे दौड़ लिए। सड़क कुछ ऊबड़-खाबड़ थी, इस कारण ऑटो बहुत तेज नहीं दौड़ पा रहा था लेकिन चालक को जैसे ही आभास हुआ कोई उसका पीछा कर रहा है, उसने रिक्शे की चाल बढ़ा दी। रिक्शा कूदते-फांदते हुए तेज भागने लगा। चम्पालाल जी को पूरा विश्वास हो गया कि वह नन्ही-सी बिटिया खतरे में है। उनकी साइकिल भी तेजी से गड्ढे कूदती हुई भागने लगी। लेकिन कहां ऑटो रिक्शा और कहां साइकिल। फासला बढ़ता जा रहा था। चम्पालाल जी भगवान का स्मरण कर रहे थे। तभी सामने से एक बाइक सबार आकर रुक गया। दो सबारी थी बाइक पर।
 
'क्या हुआ चम्पालाल जी? 'कहां भाग रहे हैं?'
 
'जल्दी वह ऑटो रिक्शा रोको।'
 
बाइक सबार सारा माजरा समझ गया। उसने तुरंत बाइक लौटाई और पांच मिनट में ही ऑटो वाले को जा घेरा। ऑटो चालक ऑटो छोड़कर भागने लगा। एक बाइक सबार ने उसे दौड़कर पकड़ लिया। बच्ची भी रोती हुई ऑटो से नीचे उतर आई। अब तक चम्पालाल जी भी पहुंच चुके थे। 
 
'चम्पालाल अंकल' कहती हुई बच्ची उनके पास आकर जोर से रोने लगी। 
 
'क्या हुआ- बेटी, क्या हुआ? कहकर चम्पालाल जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा तो वह कुछ आश्वस्त हुई 'वो रिक्शे वाले भैया।'
 
'क्या किया उसने?'
 
मुझे घर ले जाने के बदले पता नहीं कहां ले जा रहे थे।'
 
'तुमने पूछा नहीं, कहां ले जा रहे हो।'
 
'जब वह घर की तरफ न जाकर दूसरे रास्ते की तरफ जाने लगा तो मैंने पूछां- कहां जा रहे हो, घर तो उस तरफ है तो वह बोला- थोड़ा काम है घूमकर दूसरे रास्ते से चलते हैं।'
 
'फिर'
 
'उसने मुझे छुआ, बेड टच किया।'
 
इसी बीच में बाइक सबार ने पुलिस को फोन लगाकर वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया था। शीघ्र ही पुलिस पहुंच गई। ऑटो रिक्शे वाले को गिरफ्तार करके ले गई। और वह नन्ही बेटी सकुशल चम्पालाल जी के साथ अपने घर पहुंच गई। 
 
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