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चटपटी बाल कहानी : नकलची बंदर...

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बहुत पुरानी कहानी है। नदी किनारे एक गांव था। उसकी आबादी बहुत ज्यादा नहीं थी। उस गांव में एक बहुत ही गरीब आदमी सोमू रहता था। उसके परिवार में एक बेटा, उसकी पत्नी तथा उसकी बूढ़ी मां रहती थी। 
परिवार का पेट पालने के लिए वह रोजाना गांव-गांव, शहर-शहर जाकर गली-मोहल्ले घूम-घूमकर टोपियां बेचता था और उसमें बचे मुनाफे से अपना जीवनयापन करता था। बड़ी मुश्किल से वह अपनी गृहस्थी का गाड़ी चला रहा था।
 
एक दिन उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था। पेट दर्द की वजह से उसे रात को ठीक से नींद नहीं आई थी। फिर भी वह भारी मन से उठा और अपने साथ टोपियों की गठरी और एक छोटी-सी पोटली में खाना लेकर वह शहर की ओर निकल पड़ा।
रोजाना की तरह वह जंगल के रास्ते से होकर शहर की ओर जा रहा था, कि रास्ते में उसे जोरों की भूख लगी। वह एक घनी छायावाले पेड़ के नीचे बैठा। पोटली खोली और खाना खाया। रात भर ठीक से न सो पाने के कारण उसका मन थोड़ी देर सुस्ताने का हुआ। यह विचार मन में आते ही उसने अपना गमचा बिछाया और उसके पास टोपियों की गठरी रखकर वह आराम करने लगा। थोड़ी ही देर में उसे नींद लग गई। 
 
शेष कहानी अगले पेज पर ...

पास ही के एक बरगद के पेड़ पर बंदरों का एक झुंड बैठा हुआ था। उनमें से एक बंदर सोमू को सोया देखकर नीचे उतरा और गठरी पर रखी टोपी उठाकर अपने सिर पर रखकर वापस पेड़ पर जाकर बैठा। उसकी यह हरकत देखकर सभी बंदर एक-एक कर नीचे उतरे और गठरी की टोपियां निकाल कर अपने सिर पर लगाई और पेड़ पर जाकर बैठ गए। 
थोड़ी देर बाद सोमू की नींद खुली। उसने देखा कि उसकी सारी टोपियां गायब हो चुकी है। वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसे कहीं भी कोई नजर नहीं आया। फिर उसकी नजर पास ही पेड़ पर मस्ती कर रहे बंदरों पर पड़ी। उसने देखा कि सारे बंदर अपने-अपने सिर पर टोपी लगाए हुए थे। 
 
उसे समझते देर न लगी। लेकिन अब करें भी तो क्या! वह यह सोच ही रहा था कि उसे एक युक्ति सूझी। उसने बंदरों की तरफ कुछ इशारा किया और अपने सिर पर हाथ फेरकर अपनी टोपी निकालकर नीचे जमीन पर फेंक दी। बंदर तो थे ही नकलची। उन्होंने भी अपनी-अपनी टोपी सिरे से उतारी और जमीन पर फेंक दी। 
सोमू को भी इसी समय का इंतजार था। वह तुरंत उठा और जमीन पर पड़ी सारी टोपियां समेट कर अपनी गठरी में बांधी और बंदर कुछ समझ पाते इससे पहले वहां से गठरी लेकर चलता बना। 
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