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विज्ञान कथा : टुन्ना और तितली

Webdunia
-  कहानी : विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी


 
टुन्ना एक छोटी-सी लड़की थी। एकदम खिलौना गुड़िया जैसी। हंसती तो लगता था कि संगीत बज रहा है। टुन्ना को मां से बहुत प्यार था। शाला से आने के बाद वह अपनी मां के आगे-पीछे घूमती रहती थी। 
 
टुन्ना की मां घर के काम निपटाती तो टुन्ना कुछ मदद कर दिया करती थी। टुन्ना के घर के  आगे कुछ खाली जमीन थी। टुन्ना की मां ने उस जमीन पर कई प्रकार के पौधे लगा रखे थे। टुन्ना की मां उन पौधों को नियमित रूप से पानी देती थी। मिट्टी को खुरपी से पोला करती थी। टुन्ना की मां सूखी पत्तियों व सब्जी व फलों के छिलकों को कभी बाहर नहीं फेंकती थी। वह उन्हें एक गड्ढे में डालकर रखती थी। कुछ समय बाद वे सड़कर खाद में बदल जाते थे। तब उन्हें पौधों के पास की मिट्टी में मिला दिया जाता था। इससे पौधों को पोषण मिलता था। अच्‍छे पोषण के कारण टुन्ना के बगीचे के पौधे स्वस्थ रहते थे। उसके बगीचे में कई तरह के फूल खिले रहते थे।
 
मां की तरह टुन्ना को भी पौधों से प्यार हो गया था। उसने भी एक गमले में फूल वाले पौधे के बीज बोए थे। बीज बोने के बाद से वह प्रतिदिन गमले में पानी देने लगी थी। प्रतिदिन सुबह उठते ही टुन्ना गमले के पास जाती और देखती कि बीज से अंकुर निकले या नहीं। शाला से आने के बाद भी वह यही देखती थी।
 
टुन्ना को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। कुछ दिन बाद ही गमले में छोटे-छोटे पौधे निकल आए थे। उन पौधों को देख टुन्ना बहुत प्रसन्न हुई थी। उन दिनों घर पर कोई आता तो टुन्ना उसे अपने गमले के पास ले जाती और कहती- देखो, ये पौधे कितने सुंदर हैं। इन्हें मैंने उगाया है। मैं इन्हें रोज पानी देती हूं। कुछ दिन बाद इन पर फूल आएंगे।
 
टुन्ना की स्नेहभरी देखभाल से पौधे तेजी से बढ़ने लगे थे। कुछ दिन बाद उनकी शाखाओं पर कलियां निकल आई थीं। तब टुन्ना पौधों की देखभाल और भी सावधानी से करने लगी थी। 
 
शाला की छुट्टियां चल रही थीं। टुन्ना लगभग दिनभर बगीचे में अपने गमले के पास ही बैठी रहती थी। उसे यह भय रहता था कि कहीं कोई उन कलियों को तोड़ नहीं दे। 
 
 

 


कुछ दिन बाद कलियां खिलकर फूलों में बदल गईं। टुन्ना ने पिताजी से कहकर फूलों के साथ चित्र खिंचवाए थे। टुन्ना के पिताजी ने उन चित्रों को फेसबुक पर डाला तो बहुत अधिक लोगों ने उनको पसंद किया था। कई ने तो बहुत अच्‍छी टिप्पणियां भी लिखी थीं। टुन्ना को वह सब कुछ बहुत अच्‍छा लगा था। उसे पढ़ाई में भी मजा आने लगा था। 
 
उन्हीं दिनों की बात है। टुन्ना गमले के पास बैठी थी कि एक तितली उड़ती हुई आई और उसके गमले पर खिले एक फूल पर बैठ गई। टुन्ना को लगा कि तितली फूल का रस चूसकर उसे हानि पहुंचाएगी। टुन्ना ने तितली को भगा दिया। टुन्ना ने एक बड़ी थैली से गमले को इस तरह ढंक दिया कि कोई तितली फूलों पर नहीं बैठ पाएं। 
 
एक दिन टुन्ना अपने गमले के पास बैठी कहानी की किताब पढ़ रही थी तो उसे सुनाई दिया- टुन्ना, तुमने यह ठीक नहीं किया। तुम्हें फूलों को इस तरह नहीं ढंकना चाहिए। 
 
टुन्ना ने चारों ओर देखा, उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया। फिर आवाज आई- टुन्ना, मैं नीलिमा तितली बोल रही हूं। टुन्ना ने उस ओर देखा जिस ओर से आवाज आई थी। पास ही एक पेड़ की टहनी पर बैठी नीले रंग की एक तितली पंख फड़फड़ा रही थी। 
 
मैं तुम्हें अपने लगाए फूलों का रस नहीं चूसने दूंगी। मैंने बहुत परिश्रम से इन्हें उगाया है, टुन्ना ने कहा। 
 
हम तो फूलों की मित्र हैं। हमारे बिना फूलों का आगे विकास नहीं हो सकता। हमारे बिना तुम्हारे फूल कितने दुखी लग रहे हैं। टुन्ना, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास न हो तो फूलों से ही पूछ लो, नीलिमा ने कहा। 
 
नीलिमा बात सुन टुन्ना ने फूलों पर से थैली को कुछ खोल दिया। टुन्ना कुछ कहती, उससे पूर्व ही एक फूल बोला- हां टुन्ना, नीलिमा सही कह रही हैं। तितलियां हमसे भोजन लेती हैं, पर बदले में परागण में मदद करती हैं। परागण बिना फूलों के बीज नहीं बन सकते। बीज नहीं बनेंगे तो अगली ऋतु में और पौधे कैसे उगेंगे?
 
अच्‍छा तो यह बात है, यह कहते हुए टुन्ना ने थैली को पूरी तरह हटा दिया। अब तितलियां रोज फूलों पर बैठने लगीं। कुछ दिनों बाद फूलों के स्‍थान पर छोटे-छोटे फल नजर आने लगे। फलों के पकने पर टुन्ना ने उनमें से बीज निकालकर रख लिए। टुन्ना प्रसन्न थी कि इन बीजों से अगली ऋतु में फूलों के पौधे अधिक संख्या में उगा सकेगी।

साभार - देवपुत्र 
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