दिन में कितनी बार शौचालय जाना सही है?

DW
गुरुवार, 18 जुलाई 2024 (08:48 IST)
एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि आप दिन में कितनी बार टॉयलेट जाते हैं, यह आपके शरीर और स्वास्थ्य के बारे में बहुत कुछ कहता है। तो कितनी बार शौचालय जाना सही है?
 
'सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन' नाम की पत्रिका में छपे इस अध्ययन में दावा किया गया है कि सबसे अच्छा होता है दिन में कम-से-कम एक या दो बार शौचालय जाना। इससे पहले की रिसर्च ने सुझाया था कि कब्ज की वजह से इन्फेक्शन का जोखिम ज्यादा होता है और दस्त लगने से न्यूरोडीजेनरेटिव समस्याएं हो सकती हैं।
 
चूंकि ये नतीजे अस्वस्थ मरीजों में देखे गए थे, तो यह स्पष्ट नहीं हो था कि अनियमित रूप से शौचालय जाना उनकी समस्याओं का कारण था या नतीजा।
 
नए अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और 'इंस्टिट्यूट फॉर सिस्टम्स बायोलॉजी' के सीन गिब्बंस ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "मुझे उम्मीद है कि यह अध्ययन शौच करने की फ्रीक्वेंसी को मैनेज ना करने के संभावित जोखिम के बारे में डॉक्टरों के दिमाग को खोलने का काम करेगा।"
 
गिब्बंस ने समझाया कि डॉक्टर अक्सर अनियमित रूप से शौच करने को सिर्फ एक हल्की परेशानी समझते हैं। गिब्बंस और उनकी टीम ने 1,400 से भी ज्यादा स्वस्थ वयस्क वॉलंटियरों से मेडिकल, बायोलॉजिकल और जीवनशैली संबंधित डेटा इकठ्ठा किया। इसमें ब्लड केमिस्ट्री, गट माइक्रोबायोम, जेनेटिक्स आदि का डेटा शामिल था।
 
मल जब देर तक आंत में रह जाए
इन लोगों ने खुद शौच करने की जो जानकारी दी, उसे चार श्रेणियों में बांटा गया: कब्ज (एक हफ्ते में एक या दो बार शौच करना), कम से लेकर सामान्य (एक हफ्ते में तीन से छह बार), सामान्य से लेकर ज्यादा (रोज एक से लेकर तीन बार) और दस्त।
 
मल जब आंत में ज्यादा देर तक रह जाए, तो माइक्रोब सारा उपलब्ध फाइबर खत्म कर देते हैं। इसे सड़ाकर वो लाभकारी शॉर्ट-चेन फैटी एसिड में बदल देते हैं। सारा फाइबर खत्म होने के बाद माइक्रोब प्रोटीन को सड़ाने लगते हैं और पी-क्रेसोल सल्फेट और इंडोक्सिल सल्फेट जैसे टॉक्सिन बनाते हैं।
 
गिब्बंस कहते हैं, "हमें यह पता चला कि स्वस्थ लोगों में भी जिन्हें कब्ज होती है उनके खून में इन टॉक्सिनों की मात्रा बढ़ जाती है।" उन्होंने यह भी बताया कि यह टॉक्सिन विशेष रूप से गुर्दों पर काफी बोझ डालते हैं।
 
टीम ने पाया कि दस्त के मामलों में शरीर में सूजन और लिवर को नुकसान के संकेत मिले। गिब्बंस बताते हैं कि दस्त के दौरान शरीर से काफी ज्यादा पित्त एसिड निकलता है, जिसे सामान्य रूप से लिवर ने चर्बी को पिघलाने और सोखने के लिए इस्तेमाल कर लिया होता है।
 
ज्यादा रिसर्च की जरूरत
आंत में मौजूद फाइबर को सड़ाने वाले बैक्टीरिया को "स्ट्रिक्ट एनरोब" कहा जाता है। ये अच्छे स्वास्थ्य के सूचक होते हैं और ये दिन में एक या दो बार शौच करने वालों के शरीर में पनपते हैं। हालांकि, गिब्बंस ने यह भी बताया कि इस सही रेंज को और सही तरह से परिभाषित करने के लिए ज्यादा रिसर्च की जरूरत है।
 
आबादी के हिसाब से देखें तो युवा, महिलाओं और कम बॉडी मास इंडेक्स वाले लोगों को कम बार शौचालय जाने की जरूरत पड़ती है। गिब्बंस ने बताया कि पुरुषों और महिलाओं के बीच फर्क का कारण हार्मोनल और न्यूरोलॉजिकल अंतर हो सकते हैं। साथ ही, सामान्य रूप से पुरुषों का ज्यादा खाना भी एक कारण हो सकता है।
 
मानव मल से बनाई दवा
बायोलॉजिकल डेटा को लाइफस्टाइल की जानकारी से मिलाकर टीम को इस बारे में और स्पष्ट जानकारी मिली कि किस-किस को दिन में एक या दो बार शौच करने की जरूरत पड़ सकती है।
 
गिब्बंस बताते हैं, "हमने देखा कि ज्यादा फल और सब्जियां खाना सबसे बड़ा संकेत था।" साथ ही उन्होंने पर्याप्त पानी पीना, नियमित शारीरिक गतिविधियां करना और ज्यादा शाकाहारी भोजन करने का भी जिक्र किया।
 
रिसर्च के अगले चरणों में लोगों के बड़े समूह की शौच गतिविधि को मैनेज करने के लिए एक क्लीनिकल ट्रायल डिजाइन करना शामिल हो सकता है। इस समूह का अपेक्षाकृत लंबे समय तक अध्ययन करना होगा, ताकि बीमारियों से बचाव में इसकी क्षमता का आकलन किया जा सके।
सीके/एसएम (एएफपी)

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