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सेल्फी के कारण मौतों में भारत अव्वल

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, गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019 (11:39 IST)
भारत कई ऐसे मामलों में पूरी दुनिया में अव्वल है जिन पर शायद ही किसी को गर्व होगा। सेल्फी लेने के दौरान होने वाली मौतें भी इनमें शामिल हैं। युवा वर्ग में नए और खतरनाक स्थानों पर सेल्फी लेने की बढ़ती होड़ और ऐसी घटनाओं की लगातार बढ़ती तादाद से चिंतित केंद्र सरकार ने अब पर्यटकों की सुरक्षा के लिहाज से तमाम राज्य सरकारों को पर्यटन केंद्रों पर ऐसे हादसों के प्रति संवेदनशील स्थानों की पहचान करने और वहां सुरक्षा संकेत लगाने की सलाह दी है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने मंगलवार को लोकसभा में इसकी जानकारी दी।
 
 
देश में सेल्फी के प्रति युवा वर्ग में बढ़ता क्रेज जानलेवा साबित हो रहा है। बीते दिनों दुनिया भर में सेल्फी लेने के दौरान होने वाली मौतों के अध्ययन के बाद सामने आई रिपोर्ट में कहा गया कि भारत इस मामले में पूरी दुनिया में अव्वल है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली और भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए इस अध्ययन में कहा गया था कि अक्तूबर 2011 से नवंबर 2017 के बीच पूरी दुनिया में ऐसी घटनाओं में जो 259 मौतें हुई थीं उनमें से 158 भारत में हुई थीं। उसके बाद भी यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा है।
 
 
इस मामले की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेल्फी लेने के दौरान होने वाली मौतों के मामले में दूसरे स्थान पर रहे रूस में इस दौरान महज 16 और तीसरे स्थान पर रहे अमेरिका में 14 लोगों की मौत हुई थी। बीते सात वर्षों के दौरान ऐसे मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। मिसाल के तौर पर वर्ष 2011 में भारत में सेल्फी लेने के दौरान महज तीन लोगों की मौत हुर्ई थी। वर्ष 2013 में यह तादाद महज दो थी। लेकिन 2014 में यह 13, 2015 में 50 और 2016 में यह 98 तक पहुंच गई। अगले साल यानि वर्ष 2017 में ऐसी घटनाओं में 93 मौतें हुईं। मोटे अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2018 में भी मौतों का आंकड़ा 105 तक पहुंच गया। बीते एक साल के दौरान अकेले पश्चिम बंगाल में ऐसी घटनाओं में कम से कम 10 युवकों की मौत हो गई।
 
 
जर्नल ऑफ फेमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में छपी उक्त अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि सेल्फी लेने के दौरान सबसे ज्यादा मौतें झील, नदी या समुद्र में डूबने के दौरान हुईं। उसके बाद चलती ट्रेन के सामने या हिंसक जानवरों के साथ सेल्फी लेने के दौरान हुई मौतों का स्थान है। शोधकर्ताओं का कहना है कि देश में 30 साल से कम उम्र के युवक-युवतियों की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होना भी इन मौतों की एक बड़ी वजह है। मरने वालों में से 50 फीसदी यानि आधे लोग 20 से 29 आयुवर्ग के थे।
 
 
अध्ययन में पर्यटन केंद्रों खासकर पहाड़ की चोटियों, ऊंची इमारतों की छतों और झील, नदी व समुद्र के किनारों पर नो सेल्फी जोन बनाने का सुझाव दिया गया था। देश में हालांकि मुंबई समेत विभिन्न स्थानों पर एक दर्जन से ज्यादा ऐसे नो सेल्फी जोन हैं। लेकिन सेल्फी के शौकीन लोग नए-नए खतरनाक ठिकाने तलाश ही लेते हैं। अध्ययन के मुताबिक, सेल्फी लेने के दौरान हादसे का शिकार होकर जान गंवाने वालों में से 72।5 फीसदी पुरुष थे और बाकी महिलाएं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी घटनाओं में मौतों का आंकड़ा ज्यादा हो सकता है। इसकी वजह यह है कि दूर-दराज के इलाकों में होने वाली ऐसी मौतों की खबरें सामने नहीं आतीं।
 
 
तो एक सेल्फी हो जाए!
देश के कुछ राज्यों में युवाओं में बढ़ते इस जानलेवा क्रेज पर अंकुश लगाने के लिए कुछ उपाय किए गए हैं। लेकिन वह नाकाफी ही साबित हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर मुंबई के बांद्रा इलाके में जनवरी 2016 में तीन लड़कियों के डूब जाने के बाद मुंबई पुलिस ने समुद्र तटों व किलों के पास 16 नो सेल्फी जोनों की शिनाख्त की थी और वहां चेतावनी वाले बोर्ड लगाए थे। जुलाई 2017 में महाराष्ट्र सरकार ने 29 जगहों को सेल्फी के लिए खतरनाक करार दिया था।
 
 
उसी साल अक्तूबर में कर्नाटक सरकार ने भी खतरनाक जगहों पर सेल्फी लेने के खतरों से लोगों को आगाह करने के लिए जागरूकता अभियान चलाया था। अब इन घटनाओं से चिंतित केंद्र सरकार ने तमाम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से पर्यटकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने को कहा है। इनमें खतरनाक स्थानों की पहचान कर वहां चेतावनी वाले बोर्ड लगाना और ज्यादा खतरे वाली जगह पर बाड़ लगाना जैसे उपाय शामिल हैं।
 
 
भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में सहायक प्रोफेसर और "मी, माइसेल्फ एंड माइ किल्फी" शीर्षक पुस्तक के सह-लेखक पोन्नूरंगम कुमारगुरू कहते हैं, "भारत अकेला ऐसा देश है जहां सेल्फी लेने के दौरान कई लोगों की मौत आम है। एक मामले में तो सेल्फी लेने के दौरान सात लोगों की मौत हो गई थी। ऐसी ज्यादातर मौतें पहाड़ी से गिरने, पानी में डूबने या ट्रेन से कटने की वजह से होती हैं।" वह कहते हैं कि स्मार्टफोनों और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच और इंस्टाग्राम समेत दूसरे सोशल साइट्स पर अपनी अनूठी सेल्फी डालने की ललक ही युवाओं को खतरे से खेलने के लिए  प्रेरित करती है।
 
 
कुमारगुरू व उनकी टीम ने लोगों को खतरों से बचाने के लिए सेफ्टी नामक एक ऐप भी विकसित किया है जो लोगों को संबंधित जगहों के खतरों से आगाह करेगा। लेकिन वह कहते हैं, "ऐप तो किसी को रोक नहीं सकता। हादसों से बचने के लिए खुद ही सतर्कता बरतनी होगी।" विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में जागरूकता अभियान चलाने में गैर-सरकारी संगठनों की सहायता भी जरूरी है।" रोक-थाम के ठोस उपाय नहीं करने तक भारत इस मामले में अव्वल ही बना रहेगा।

 
रिपोर्ट प्रभाकर, कोलकाता
 

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